उल्लेखनीय है कि होर्मुज क्षेत्र में अब भी सैकड़ों जहाज फंसे हुए हैं, जिन्हें निकालने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कुछ ही दिन पहले दो नए समुद्री मार्गों का एलान किया था। ईरान ने इसे मानने से तो इन्कार किया ही, सिंगापुर के एक जहाज पर ड्रोन से हमला भी कर दिया। इस हमले में अधिक नुकसान तो नहीं हुआ, लेकिन इससे होर्मुज पर एकाधिकार बनाए रखने की ईरान की मंशा का तो पता चलता ही है। जिस तरह से ट्रंप ने इस्लामी गणराज्य के अस्तित्व के खत्म होने की धमकी दी है, और बदले में ईरान ने भी मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही है, उससे पश्चिम एशिया में फिर से भड़की इस आग के जल्द खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
इससे दुनिया के ऐसे दौर में पहुंचने का संकेत भी मिलता है, जहां युद्ध धीरे-धीरे न्यू नॉर्मल बनते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रथम विश्वयुद्ध से भी अधिक समय तक चलने वाला रूस-यूक्रेन युद्ध है, जो आज भी किसी न किसी रूप में सुलग रहा है। अगर पश्चिम एशिया भी इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर अधिक गंभीर हो सकता है। ज्यादा चिंता इस बात की है कि सैन्य कार्रवाई और प्रतिशोध का यह सिलसिला कूटनीति के लिए उपलब्ध अवसरों को भी कमजोर कर रहा है।
इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में अधिकतर संघर्षों का स्थायी समाधान युद्ध से नहीं, बल्कि बातचीत और समझौतों से ही निकला है। अगर दोनों पक्ष सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और जवाबी हमलों की नीति पर चलते रहे, तो अविश्वास की खाई और गहरी होगी तथा किसी भी मध्यस्थता की संभावना क्षीण पड़ती जाएगी। ऐसे में, भारत सहित दुनियाभर के देशों के लिए यह समय संतुलित कूटनीति अपनाने का है। भारत के अमेरिका, इस्राइल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ महत्वपूर्ण राजनीतिक व रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए, उसे संवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन जारी रखना चाहिए। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तेल भंडार और वैकल्पिक आयात स्रोतों को मजबूत करना भी राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।