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कब है सोलह मई!

Tue, 13 May 2014 07:12 PM IST
सूर्यकुमार पांडेय
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सोलह मई कब है? कब है, सोलह मई?- गब्बर पूछ रहा है, अपने सांभा से। सोलह मई सोलह को है सरदार!- बताता है सांभा। गब्बर- यह तो मैं भी जानता हूं। मतदान के सारे चरण पूरे हो लिए। अब तो अपने चरणों का ही भरोसा है। ठाकुर यहां हमारे ठिकाने पर आ जाए, उससे पहले अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भाग लेने में ही भलाई है! सांभा- सरदार! ठाकुर आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप उसके दोनों हाथ पहले ही काट चुके हैं। गब्बर- मैंने यही तो गलती की। मुझे उसके पांव काटने चाहिए थे। सुना है, उसने अपने दोनों पांवों में कीलें ठुंके जूते पहन रखे हैं। इन दिनों कोई जय और बीरू की जोड़ी भी है। ठाकुर आ गया, तो वह मेरे 'पंजों' को लहूलुहान कर सकता है।
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सांभा- सरदार, मैंने आपका नमक खाया है, कोयला नहीं। मैं तो ठाकुर की पार्टी ज्वाइन कर लूंगा। गब्बर- कोल हराम! मुझे तेरी नीयत पर पहले से ही शक था। वे दो थे और तुम तीन। तुम सबको ठाकुर के क्षेत्र में भेजा था। और तुम सब खाली हाथ वापस लौट आए।

सांभा- सरदार, हम क्या करते? महंगाई के चलते गांव वालों के पास देने को अनाज ही नहीं था। सड़कें टूटी थीं। भागते नहीं, तो हमारे घोड़े उन सड़कों के गड्ढों में फंस गए होते। तिस पर जय और बीरू गांव की इकलौती सूखी पड़ी पानी की टंकी पर चढ़े हुए थे। टंकी में पानी नहीं था, क्योंकि गांव में बिजली नहीं आती है।
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गब्बर- ओ मेरी चीयरगर्लो, चुल्लू भर पानी तो होगा वहां। टंकी पर चढ़कर उसी में डूब मरते। सांभा- अब सरदार आप हमें चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ। बहुत दिनों तक आपकी सेवा की है। सेवा ही हमारा धर्म है। आगे से हम ठाकुर की सेवा में लग जाएंगे। गब्बर- हवा को देखकर रंग बदलने वाले दलबदलुओ, छमिया का डांस मैं ही दिखवा सकता था तुमको। कल ठाकुर आ गया, तो नचा-नचाकर तुम सबको ही छमिया बना देगा।
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सांभा- तो ठीक है सरदार, आप अपने फेयरवेल का इंतजाम खुद कर लो। मुझे तो कल ही जय-बीरू के यहां डिनर का इन्विटेशन मिल चुका है।
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