नई सरकार के शपथ लेते ही नया दौर शुरू होना चाहिए था। लेकिन आने वाले 'अच्छे दिन' अभी दूर हैं, क्योंकि उसके दो मंत्रियों के वक्तव्यों से अतीत का लंबा साया थोड़ा और लंबा हो गया है। सक्रिय मीडिया के इस जमाने में जब हर बयान तत्काल रिकॉर्ड हो जाता है, तब छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी दिखने लगती है। नजमा हेपतुल्लाह के इरादे बेशक नेक थे, जब उन्होंने यह टिप्पणी की कि मुसलमानों को अल्पसंख्यक नहीं कहना चाहिए, क्योंकि भारत में उनकी आबादी इतनी है कि उनको दूसरी बहुसंख्यक कौम के तौर पर देखा जा सकता है। इसलिए उनके लिए आरक्षण का सवाल नहीं उठाना चाहिए। लेकिन उन्हें अपने शब्द ध्यान से चुनने चाहिए थे। जाहिर है कि उनका इशारा अल्पसंख्यकों की समस्याओं को नए सिरे से देखने की तरफ था।
चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने बार-बार यह स्पष्ट किया था कि उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब हर भारतीय को बराबर के अधिकार मिलने से है। ऐसा होना जरूरी भी है, क्योंकि कांग्रेस के दौर में मुस्लिमों को सिर्फ वोट बैंक बनाकर रखा गया। आज वे अन्य कौमों से पिछड़े हुए हैं, तो इसका मुख्य कारण यही है कि कांग्रेस ने उन्हें केवल चुनाव के समय इस्तेमाल किया, लेकिन न तो उनकी गरीबी दूर करने का कभी प्रयास किया और न ही कुछ और। हमेशा उनको यह याद दिलाया गया कि उनको खास सुविधाओं की जरूरत है। ऐसा करके मुसलमानों के साथ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अन्याय होता रहा। अगर अब नए सिरे से उनकी समस्याओं को देखा जाए, तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन नजमा जी अगर कुछ महीने बाद अपनी बात कहतीं, तो ज्यादा अच्छा होता।
ठीक ऐसा ही कहा जा सकता है प्रधानमंत्री कार्यालय के नए मंत्री जितेंद्र सिंह के उस बयान के बारे में, जो उन्होंने दफ्तर में कदम रखते ही टीवी पत्रकारों को दे डाला। क्या वह भूल गए थे कि अनुच्छेद 370 के जिक्र से ही कश्मीर घाटी में आग लग सकती है? नजमा जी की तरह शायद जितेंद्र सिंह भी प्रधानमंत्री के उस बयान का समर्थन करना चाह रहे थे, जो उन्होंने जम्मू में चुनाव प्रचार करते समय दिया था। मोदी जी ने कहा था, 'शायद अनुच्छेद 370 के होने से कश्मीर को नुकसान हुआ है, लाभ नहीं। जम्मू-कश्मीर के लोगों को इस अनुच्छेद को नए नजरिये से देखना चाहिए।'
उनकी बात ठीक हो, न हो, उनके मंत्री को क्या जरूरत थी इस समय अनुच्छेद 370 जैसे संवेदनशील मामले को उठाने की? अगले दिन उन्होंने यह कहने की कोशिश जरूर की कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया, लेकिन तब तक हंगामा मच गया था। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भारत से अलग हो जाने की बातें कहनी शुरू कर दीं, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग भी इस विवाद में कूद पड़े और राम माधव ने उमर अब्दुल्ला को याद दिलाया कि कश्मीर उनकी निजी जायदाद नहीं है। किसी भी नए प्रधानमंत्री के लिए उनके पहले सौ दिन बेहद नाजुक होते हैं। नई लोकसभा में भाजपा के जो सांसद चुनकर आए हैं, उनमें एक भी मुस्लिम नहीं है। यह भी सच है कि नए प्रधानमंत्री को ज्यादातर मुस्लिम शक की नजरों से देखते हैं। इसलिए उनके साथ नए सिरे से रिश्ता कायम करना जरूरी है। यह क्या भूल गए थे मोदी जी के नए मंत्री?
यह तो जरूर भूल गए थे कि भारत के लिए अभी नया दौर शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि अतीत का वह लंबा साया अभी तक लंबा ही है और तब तक रहेगा, जब तक नए प्रधानमंत्री यह साबित करके नहीं दिखाते हैं कि वह वास्तव में विकास के मसीहा हैं, हिंदुत्व के नहीं। भारत के लिए तो नया दौर तब शुरू होगा, जब नरेंद्र मोदी यह साबित करके दिखाएंगे कि 'सबका साथ, सबका विकास' वाली बात वह दिल से कह रहे हैं।