दरअसल, ‘मैक्सिंग’ शब्द की शुरुआत गेमिंग के मिन-मैक्सिंग कॉन्सेप्ट से हुई। इसमें खिलाड़ी अपने कैरेक्टर की सबसे उपयोगी खूबियों को अधिकतम करते हैं और कम उपयोगी खूबियों को नजरअंदाज करते हैं। बाद में, यही सोच सोशल मीडिया पर पहुंची और खासकर लुक्समैक्सिंग के जरिये लोकप्रिय हुई। अब आकर्षण, फिटनेस, खान-पान, उत्पादकता और व्यक्तित्व तक, हर चीज को बेहतर से बेहतर बनाने की कोशिश हो रही है। समस्या यह है कि जिंदगी कोई वीडियो गेम नहीं है। यहां कोई अंतिम लेवल नहीं, जहां पहुंचकर हम कह सकें कि अब हम पूरी तरह ‘श्रेष्ठ’ (ऑप्टिमल) हैं। स्वास्थ्य, रिश्ते, भावनाएं और जीवनशैली लगातार बदलती रहने वाली प्रक्रियाएं हैं। ऐसे में, हर चीज को परफेक्ट बनाने की कोशिश करना खुद पर अनावश्यक दबाव डालने के साथ बेवजह तनाव पैदा कर सकता है। सोशल मीडिया इस दबाव को और बढ़ाता है।
आदर्श शरीर, परफेक्ट डाइट और बेहतर जिंदगी की सोच अत्यधिक चिंता, अनियमित खान-पान और लगातार खुद की तुलना दूसरों से करने जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है। इसलिए, जरूरत है ‘मॉडरेशन-मैक्सिंग’ की। यानी खुद को बेहतर बनाने की इच्छा गलत नहीं है। पर, सवाल यह है कि उसकी कीमत क्या है? अगर कोई आदत हमें स्वस्थ, आत्मविश्वासी और खुश बनाती है, तो उसे अपनाना अच्छा है। लेकिन, अगर वही आदत तनाव, आत्म-आलोचना और दूसरों से तुलना बढ़ाने लगे, तो रुककर सोचना बेहद जरूरी हो जाता है। इसमें आत्म-करुणा (सेल्फ-कंपैैशन) व माइंडफुलनेस मदद कर सकते हैं। खुद को स्वीकार करना सुधार की इच्छा छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है-कमियों को इन्सानी स्वभाव का हिस्सा मानते हुए खुद के प्रति थोड़ा नरम होना।
जिंदगी का मकसद खुद का ‘परफेक्ट वर्जन’ बनना नहीं, बल्कि एक बेहतर और संतुलित जिंदगी जीना है। हर चीज को मैक्स करने की जरूरत नहीं है। कभी-कभी ‘बस ठीक है’ भी बिल्कुल सही होता है।