फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

खुद को कब साबित करेंगे राहुल, रणनीति बदलने के बारे में सोचना ही होगा

सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 22 Oct 2019 08:27 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
राहुल गांधी - फोटो : a

कुछ वर्ष पहले टेनिस के महान खिलाड़ी राफेल नडाल जब नोवाक जोकोविच से आठवीं बार हार गए थे, तब एक चिंतित पत्रकार ने उनसे पूछा, राफेल, क्या हो रहा है? राफेल ने निडरता से ईमानदार जवाब दिया था, मेरा खेल उसे हरा नहीं पा रहा है! यहां तक कि मेरा सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी उसे हराने में सक्षम नहीं है! मुझे अपने खेल को फिर से तलाशना और उसमें कुछ विशेष जोड़ना होगा, ताकि उससे बेहतर कर सकूं। यहां राहुल गांधी के लिए एक सबक है, अगर उनके पास नडाल जैसे खिलाड़ी की भावना है।



इस साल लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल ने जोरदार प्रचार किया और देश में जो कुछ भी गलत हो रहा है, उसके लिए नरेंद्र मोदी पर लगातार हमला किया। नडाल की तरह राहुल को समझना होगा कि उनका सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी उन मोदी को हराने के लिए पर्याप्त नहीं था, जिन्होंने लाखों भारतीयों के जीवन को बेहतर बनाने और भारत को एक सुरक्षित और मजबूत राष्ट्र बनाने केे अंतहीन फैसलों के जरिये अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया।


राहुल द्वारा गिनाई गईं कई विफलताएं पूरी तरह से झूठी नहीं हो सकती थीं, लेकिन देश के मतदाताओं ने सोचा कि मोदी के विरोधियों ने उनके बारे में जो कुछ कहा, उसके बावजूद राहुल को एक मौका देने के बजाय मोदी को दूसरा मौका देना बेहतर होगा। आखिर नेतृत्व से संबंधित सभी जनमत सर्वेक्षणों में मोदी ने हमेशा राहुल से 24 अंक की बढ़त दर्ज की।


अगर राहुल के चाटुकार सलाहकारों में से किसी में साहस है, तो उसे उनके सामने जाकर दोटूक बताना चाहिए कि मोदी के खिलाफ एक ही आरोप को दोहराने के बजाय, जिसे जनता नेे कई बार सुना और खारिज कर दिया है, उन्हें खुद को मजबूत करने और मोदी का मुकाबला करने के लिए अपनी रणनीति बदलने के बारे में सोचना चाहिए। बिना स्पष्ट और ईमानदार आत्मनिरीक्षण के कांग्रेस के पास सत्ता में वापस लौटने का कोई मौका नहीं है। हर कोई सोचता है कि प्रधानमंत्री पर हमला करना नुकसानदेह है, राहुल गांधी को इन आवाजों को सुनना चाहिए।


भारतीय अर्थव्यवस्था की बदहाली पर टिप्पणी करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कथित तौर पर कहा कि अर्थव्यवस्था को ठीक करने से पहले उसकी बीमारियों और उसके कारणों का निदान करने की जरूरत है। अगर इस वाक्य में 'अर्थव्यवस्था' के बदले कोई 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' लिख दे, तो यह देश की सबसे पुरानी पार्टी पर पूरी तरह लागू होता है। कांग्रेस इस बात का भी पता नहीं लगा पाई है कि वह किस बीमारी से ग्रस्त है और उसे मालूम नहीं है कि अपनी सेहत सुधारने के लिए उसे क्या करना चाहिए। पिछले चार-पांच महीने में कांग्रेस के भीतर जो सबसे स्तंभित करने वाली घटना हुई, वह यह कि उसके युवा और जुझारू अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया और गांधी-नेहरू परिवार से बाहर कोई उत्तराधिकारी नहीं मिला, तो अंत में राहुल की मां ने ही अंतरिम अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली!


राहुल गांधी के पिछले हफ्ते के भाषण भी राफेल सौदे, किसान आत्महत्या, कृषि संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि पर केंद्रित रहे, जिनसे लगता है कि उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा। हाल ही में उन्होंने नरेंद्र मोदी पर सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने और अपने दोस्तों को देने का आरोप लगाते हुए 'बेचेंद्र मोदी' कहा, जो उसी पुरानी बीमारी को बताता है। शायद उन्हें अंदाजा नहीं है कि मणिशंकर अय्यर की ‘चायवाला’ और ‘नीच’ जैसी अपमानजनक टिप्पणियों ने कांग्रेस का कितना नुकसान किया! कांग्रेस धीरे-धीरे कोमा में जा रही है। कांग्रेस में एक करिश्माई नेता का अभाव है, जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके, अपनी चिंताओं को दूर कर सके, और एक प्रेरक व दृढ़ दृष्टिकोण पेश कर सके। लगता है कि दो राज्यों के लिए हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस का वही हाल होगा, जैसा लोकसभा चुनाव में हुआ था।


राजनीति में वास्तविकता से ज्यादा धारणाएं मायने रखती हैं। 2014 के चुनाव से पहले यूपीए-2 के साथ भ्रष्टाचार जुड़ गया और वह सत्ता से बाहर होने का हकदार था। 2019 में मोदी का व्यक्तित्व, पांच वर्षों का उनका कामकाज और न्यू इंडिया का उनका दृष्टिकोण राहुल गांधी द्वारा एनडीए की विफलताएं गिनाने पर भारी पड़ गया। 'चौकीदार चोर है' का नारा काम नहीं कर पाया। बालाकोट हवाई हमले से पैदा राष्ट्रवादी उत्थान और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण ने भी मोदी की मदद की।
विज्ञापन


अब वह मोदी-2.0 के सौ दिनों के रिकॉर्ड कामकाज से लैस हैं-तीन तलाक, अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने,  जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग करने, पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की चर्चा, कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, ह्यूस्टन में हाउडी मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के कारण मोदी सरकार को मजबूत और राष्ट्रवादी माना जाता है, जो फैसले लेने में सक्षम है और बाहरी खतरों से भारत को बचाने के लिए तैयार है। बेशक राज्यों के विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेताओं का महत्व होता है, लेकिन मोदी का महत्व सबसे ज्यादा है! इसके विपरीत विपक्ष पूरी तरह से अव्यवस्थित है, बहुत सारे नेता आपस में भिड़ रहे हैं, मोदी का मुकाबला करने के लिए उनके पास कोई मजबूत आख्यान नहीं है और कार्यकर्ता निरुत्साह हैं। कई कांग्रेसी नेता मुकदमों से जूझ रहे हैं।


केवल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ही स्मार्ट तरीके से काम कर रहे हैं। उनके पास बहुत कम अधिकार हैं, फिर भी कम से कम अभी के लिए उन्होंने केंद्र सरकार व एलजी के खिलाफ अपने आरोपों को किनारे रख दिया है और अपनी सरकार की उपलब्धियों के लिए मीडिया में चर्चा में हैं। टीवी चैनलों पर आप समर्थकों की परेड कराने के अलावा उन्होंने शून्य बिजली बिल, मोहल्ला क्लिनिक और सरकारी स्कूलों से लोगों को लाभ मिलने का दावा किया है। डेंगू पर वार, सड़क हादसों के पीड़ितों की हर कीमत पर जान बचाना, ऑड-ईवन के जरिये प्रदूषण घटाने की कोशिश बहुत से लोगों के जेहन में गूंज रही है। राष्ट्रीय दैनिकों में पूरे पृष्ठ के विज्ञापन देने के चलते वह प्रधानमंत्री मोदी के बाद एनसीआर में सबसे अधिक दिखाई देने वाला चेहरा बन गए हैं। राहुल केजरीवाल से कुछ गुर सीख सकते हैं। वास्तव में उनके साथ हाथ मिला लेना ही बुद्धिमानी होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next