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जब महात्मा बुद्ध को सीख मिली

Wed, 15 May 2013 09:44 PM IST
शिवकुमार गोयल
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भगवान बुद्ध एक दिन धर्म का संदेश देते हुए गांव की ओर जा रहे थे। रास्ते में विश्राम के लिए वह एक सुंदर तालाब के किनारे वृक्ष के नीचे बैठ गए। तालाब में सुंदर पुष्प खिले थे। विभिन्न रंगों के कमल पुष्पों की अनूठी छटा देख वह अभिभूत हो उठे और तालाब के जल में उतर पड़े।
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कमल की अनूठी सुगंध का सेवन कर वह अपनी सुध-बुध खो बैठे। सुगंध से तृप्त होकर जैसे ही वह जलाशय से बाहर निकले कि उन्हें देवकन्या की वाणी सुनाई दी, महात्मन, तुम बिना कुछ दिए इन पुष्पों की सुरभि का सेवन करते रहे। यह चौर-कर्म है।

तथागत ने ये शब्द सुने, तो हतप्रभ रह गए। अचानक एक व्यक्ति ने तालाब में प्रवेश किया और कमल तोड़ने लगा। देवकन्या उसे कमल तोड़ते देखते रही। तथागत ने कहा, देवी, मैंने तो केवल गंध का ही सेवन किया था, और तुमने मुझे चोर कह दिया। यह व्यक्ति निर्दयता के साथ फूलों को तोड़कर किनारे फेंक रहा है। तुम इसे क्यों नहीं रोक रही?
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देवकन्या ने कहा, भगवन, सांसारिक मानव अपने लाभ के लिए धर्म-अधर्म में भेद नहीं कर पाता। ऐसा अज्ञानी व्यक्ति क्षम्य है, किंतु जिसका अवतार धर्म प्रचार के लिए हुआ है, उसे तो प्रत्येक कृत्य के उचित-अनुचित का विचार करना चाहिए। तथागत समझ गए कि यह देवकन्या साधारण नहीं है। वह श्रद्धा से उसे प्रणाम कर आगे बढ़ गए।
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