बड़ी संख्या में ऋषि-मुनि व पुरोहितों की देख-रेख में यज्ञ आरंभ हुआ। पर इस महान यज्ञ की सूचना जैसे ही देवराज इंद्र को मिली, उन्हें महर्षि पर संदेह हुआ। स्वभाव से संशयी इंद्र को लगा कि महर्षि अगस्त्य शक्तियां बढ़ाने और देवलोक पर कब्जा करने के लिए यज्ञ कर रहे हैं। इंद्र ने यज्ञ को विफल करने का निश्चय किया और मेघों को उस क्षेत्र में वर्षा न करने की आज्ञा दे डाली।
इंद्र द्वारा वर्षा रोक दिए जाने से अन्न की भारी कमी हो गई। इससे महर्षि अगस्त्य और अन्य ऋषि-मुनि चिंतित हो गए। अगस्त्य को इंद्र की चाल समझ में आ गई। उन्होंने ऋषियों से कहा, ‘आप चिंता न करें। मैं जानता हूं कि देवराज इंद्र भय के कारण वर्षा नहीं होने दे रहे हैं। इसलिए मैं स्वयं इंद्र का कार्यभार संभालूंगा, लेकिन यह यज्ञ नहीं रुकेगा!’
अगस्त्य बोले, ‘मैं चिंतन मात्र से इस यज्ञ को संपन्न कर सकता हूं। इसके अलावा मुझे स्पर्श-यज्ञ की विधि भी ज्ञात है, जिसमें संचित अन्न का स्पर्श कर लेने मात्र से देवता तृप्त हो जाते हैं। इसी भावना से यज्ञ भी संपन्न हो जाता है।’ यह सुनकर ऋषि बहुत प्रसन्न हुए।
अगस्त्य ने आगे कहा, ‘देवराज इंद्र ने यदि वर्षा नहीं की, तो भी मेरे पास पर्याप्त अन्न और भोजन-सामग्री उपलब्ध है, जिससे मैं आपका बारह वर्ष तक भरण-पोषण कर सकता हूं। मैं अपने तपोबल से प्रत्येक व्यक्ति को उसकी पसंद का आहार उपलब्ध करवा दूंगा, परंतु यह यज्ञ अब किसी के रोके नहीं रुकेगा।’
ऋषियों ने यह सुना, तो वे बोले, ‘महर्षि, आप भोजन की व्यवस्था तो कर देंगे, लेकिन यज्ञ पूर्ण करने के लिए धन, सुवर्ण, देवताओं आदि की उपस्थिति भी तो चाहिए। इन सबका क्या होगा?’
यह सुनकर महर्षि अगस्त्य बोले, ‘यदि ऐसा है, तो मैं स्वयं इंद्र बन जाता हूं।’ ‘इंद्र! वह कैसे?’ एक पुरोहित ने आश्चर्य से पूछा। अगस्त्य बोले, ‘मैं अपने तपोबल से इंद्र की भूमिका अर्जित कर रहा हूं और यह आदेश देता हूं कि तीनों लोकों में जितना भी सुवर्ण और धन है, वह सब यहां मेरे सामने आ जाए। अप्सराओं के समूह, गंधर्व, किन्नर, देवी-देवता, विश्वावसु आदि समस्त प्रमुख जन तत्काल मेरे यज्ञ में उपस्थित हो जाएं।’
अगस्त्य के ऐसा कहते ही उनकी तपस्या के प्रभाव से सारी वस्तुएं प्रकट हो गईं। अगले ही क्षण, अगस्त्य ने इंद्र का समस्त वैभव अपने अधिकार में ले लिया।
इंद्र ने अपनी पराजय स्वीकार की और बादलों को वर्षा का आदेश दे दिया। यह देख अगस्त्य मुस्कराए। अगस्त्य स्वभाव से दयालु थे, इसलिए उन्होंने इंद्र को क्षमा कर दिया और उनका वैभव भी लौटा दिया।
देवलोक में बैठे इंद्र ने यह दृश्य देखा, तो वह भयभीत हो गए। वह समझ गए कि अगस्त्य की शक्ति को आंकने में उनसे भूल हो गई थी। इंद्र ने तत्काल अपनी पराजय स्वीकार की और बादलों को वर्षा का आदेश दे दिया। इसके तुरंत बाद उस क्षेत्र में वर्षा होने लगी। यह देखकर अगस्त्य मन ही मन मुस्कराए। अगस्त्य स्वभाव से दयालु थे, इसलिए उन्होंने इंद्र को क्षमा कर दिया और उनका वैभव भी लौटा दिया। इस तरह अगस्त्य ने इंद्र बनकर अपना यज्ञ संपन्न किया।