बार-बार कहा गया कि पेरिस ओलंपिक अब तक का सबसे किफायती और नए तौर-तरीके वाला आयोजन है, जिसकी अधिकांश लागत निजी स्रोतों से आ रही है। पेरिस ओलंपिक की लागत करीब 4.4 अरब डॉलर रही। ओलंपिक में पुराने अंतरराष्ट्रीय प्रायोजक जैसे-टोयोटा, कोक, एयर बीनएनबी और नाइकी के अलावा स्थानीय कंपनियां भी आईं, जैसे आर्सेलर मित्तल ने मशालों का स्टील बनाया, तो लुई वितों ने मेडल। ओलंपिक की एक-तिहाई लागत कॉरपोरेट ने उठाई, जबकि बची हुई लागत टिकटों, लाइसेंसिंग और ओलंपिक कमेटी ने अपने फंड से दी। दावा है कि पेरिस का करीब 96 फीसदी बजट निजी कंपनियों से आया।
आधुनिक ओलंपिक फ्रेंच आभिजात्य और शिक्षाविद पियरे द कुबर्तिन की देन है। इसी पेरिस के सोरबोन में 1894 में इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल बनी और 1896 में एथेंस में पहला आधुनिक ओलंपिक हुआ, जिसमें 14 देश आए थे। उनके देश और शहर में फिर मजमा लगा, तो ओलंपिक वाले इस खेल में उत्साह से ज्यादा, इसकी छवि को लेकर सतर्क रहे। ओलंपिक महंगा तमाशा है और आयोजकों का इतिहास बला का दागदार है। इन खेलों को भव्य के बजाय सस्ता रखने की मुहिम पेरिस से क्यों शुरू हुई?
आइए, टाइम मशीन में बैठकर चलते हैं उस दौर में, जहां एक ओलंपिक के बाद कुबर्तिन का मिशन खतरे में पड़ गया। फिर ओलंपिक को बचाने के लिए आयोजन का पूरा चोला ही बदल दिया गया। और यह लीजिए, हम आ गए एम्सटर्डम। यह 1970 की मई है। ट्यूलिपों के देश की ऐतिहासिक राजधानी। 1976 के 21वें ओलंपियाड के मेजबान का फैसला होना है। इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी की बैठक में लंबी खींचतान चली है। अंतत: मास्को और लॉस एंजिलिस को हरा कर कनाडा का मॉन्ट्रियल शहर 1976 के ओलंपिक की मेजबानी ले उड़ा है।
मॉन्ट्रियल के मेयर जॉन ड्राप्यू ने मेजबानी लेते हुए एलान किया कि 'जैसे कोई पुरुष मां नहीं बन सकता, ठीक उसी तरह ओलंपिक खेलों से कभी घाटा नहीं हो सकता।' अब हम सीधे मॉन्ट्रियल जा रहे हैं, जहां लंबा प्रवास होगा। शहर में प्रवेश करते ही आपको लगने लगा होगा कि एम्सटर्डम में जो सुना था, उससे बिल्कुल विपरीत लग रहा है। मौसम नागवार है मॉन्ट्रियल का। राजनीतिक आबोहवा और भी ज्यादा जहरीली है। क्यूबेक के उग्रवादी संगठन एफएलक्यू ने ब्रिटिश काउंसलर जेम्स क्रॉस और राज्य के डिप्टी प्रीमियर पियरे लोपार्टे का अपहरण कर लिया है। प्रधानमंत्री पियरे त्रूदो ने शहर में मार्शल लॉ लगा दिया है। बख्तरबंद गाड़ियां गश्त कर रही हैं।
मौसम की मार और फौज की निगहबानी के बीच हम निकलते हैं, ओलंपिक की तैयारियां देखने। मेयर जॉन ड्राप्यू एम्सटर्डम में बोल आए हैं कि ओलंपिक का मतलब ही है मेजबान को आर्थिक लाभ। वह ओलंपिक की मेजबानी पर करीब 30 करोड़ डॉलर के खर्च का हिसाब लेकर एम्सटर्डम पहुंचे थे। इसमें से करीब 7.1 करोड़ कनाडाई डॉलर नए ओलंपिक स्टेडियम पर खर्च हो रहे हैं। वह खुद इस स्टेडियम और खेल गांव का निर्माण देख रहे हैं। मॉन्ट्रियल के अखबारों में छह माह बीतते-बीतते देरी की खबरें तैरने लगी हैं। ऑटोमेटिक छत वाला भीमकाय स्टेडियम विवादों में फंस गया है।
ताकतवर क्यूबेक लेबर यूनियन ओवरटाइम की मांग को लेकर हड़ताल पर चली गई है। हड़तालों, भ्रष्टाचार के आरोपों और असंख्य विवादों को देखते हुए हम अब 1975 में आ गए हैं। तैयारी बुरी तरह पिछड़ गई है। आयोजन खतरे में है। सरकार ने फ्रेंच आर्किटेक्ट टैलीबर्ट को हटा दिया है। एक साल बचा है और अंधाधुंध पैसा झोंककर किसी तरह काम कराया जा रहा है। 1974 से 1976 के बीच करीब 155 दिनों की हड़तालें हो चुकी हैं।
ले-देकर किसी तरह ओलंपिक के उद्घाटन का दिन आया। इस स्टेडियम में खेल से ज्यादा चर्चा दो बातों की है। एक, ओलंपिक की लागत 30 करोड़ डॉलर की जगह 1.5 अरब डॉलर हो गई है और दूसरा, मॉन्ट्रियल गजट में कार्टूनिस्ट एसलिन का कार्टून, जिसमें मेयर जॉन ड्राप्यू ‘गर्भवान’ दिखाए गए हैं। मेयर ड्राप्यू फोन से देश के सबसे बड़े गर्भपात विशेषज्ञ से बात कर रहे हैं। मेयर जॉन ड्राप्यू ने एम्सटर्डम में ओलंपिक की मेजबानी लेते हुए एलान किया था कि जैसे कोई पुरुष मां नहीं बन सकता, ठीक उसी तरह ओलंपिक खेलों से कभी घाटा नहीं हो सकता। मॉन्ट्रियल ओलंपिक इस शहर पर करीब 1.6 अरब कनाडाई डॉलर का कर्ज छोड़ गया है, जो 2006 में जाकर खत्म होगा।
मन्ट्रियल की विफलता ने सरकारों को डरा दिया है। 1980 का मास्को ओलंपिक शीतयुद्ध की चपेट में फंसकर विफल हो गया है। फिर ओलंपिक की मेजबानी के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। लॉस एंजिलिस को ओलंपिक मिल गया। कुबर्तिन का सपना खतरे में है। यह 1981 का दौर है। आइए, सीधे चलते लॉस एंजिलिस ओलंपिक कमेटी के दफ्तर में, जहां आपको दिख रहे हैं, कमेटी के चेयरमैन पीटर उबेरॉथ। पोलो खिलाड़ी और ट्रैवल कारोबारी उबेरॉथ पर ओलंपिक की मेजबानी नहीं, बल्कि इस परंपरा को बचाने का जिम्मा है। उबेरॉथ ने एलान कर दिया है, ओलंपिक अब अकेले नगरीय सरकारों की जिम्मेदारी नहीं होंगे। इनमें कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप आएगी। निजी फंड निवेश होंगे। खूब विज्ञापन होंगे। कुछ दकियानूसी उन्हें बिसूर रहे हैं। इस बीच खेल शुरू हो गए हैं। इंतजार पदक तालिका का नहीं है। दुनिया तो यह जानना चाहती है कि उबेरॉथ के ओलंपिक बिजनेस मॉडल से क्या हुआ?
...यह लीजिए साहब, तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उबेरॉथ ने बताया कि लॉस एंजिलिस को ओलंपिक से करीब 22.5 करोड़ डॉलर का मुनाफा हुआ। ओलंपिक अब मुनाफे का मेला हो गया है। उबेरॉथ दूसरे पियरे द कुबर्तिन बन गए हैं, जिन्होंने ओलंपिक को उबार लिया। इसके बाद तो फिर ओलंपिक काउंसिल की निकल पड़ी। बड़े-बड़े ब्रांड, लाइसेंस, प्रसारण राइट्स...पैसा ही पैसा...भ्रष्टाचार बोनस में।
पेरिस का मेला उखड़ चुका है। इस बार ओलंपिक घाटे में नहीं रहा। वैसे बीते तजुर्बों के बाद कहा जा रहा है कि बार-बार शहर-शहर आयोजन का भारी खर्च क्यों करना? नए स्टेडियम बनाना और फिर उनका कोई इस्तेमाल नहीं! क्यों न एक ही शहर को हमेशा के लिए मेजबानी दे दी जाए और स्थायी बुनियादी ढांचा बना दिया जाए। क्या आप इससे सहमत हैं? बहस दिलचस्प है...
हम जल्द मिलेंगे, अगले सफर पर...