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जब एक समाज विफल होता है

Fri, 03 Jan 2014 01:43 AM IST
रंजना कुमारी
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पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले की सोलह वर्षीय बालिका के साथ जिस तरह पिछले वर्ष अक्तूबर में दो बार सामूहिक बलात्कार की घटना हुई और बाद में उसे जलाकर मार डालने की बात सामने आई है, वह यह सोचने पर मजबूर करती है कि एक समाज के रूप में आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं? वहां की ममता बनर्जी सरकार ने पीड़िता एवं उसके परिवार को सुरक्षा देने में जैसी लापरवाही दिखाई, वह शर्मनाक है।
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और सबसे दुखद यह है कि अब पीड़िता की मौत पर राजनीति हो रही है। उसकी लाश पर कब्जे को लेकर, जिस तरह का सियासी ड्रामा चला, उसकी जितनी भर्त्सना की जाए, कम है। लगता है कि राजनेताओं के पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा है और वे बलात्कार को ही मुद्दा बना रहे हैं।

दिसंबर, 2012 में जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई थी, तो उसके खिलाफ देशभर में तीखी प्रतिक्रिया जताई गई थी और सरकार को मजबूर होकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए कठोर कानून बनाने पड़े थे। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है कि सामूहिक बलात्कार जैसे अपराध घटने के बजाय बढ़ते ही क्यों जा रहे हैं।
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असल में इसकी कई वजहें हैं। पहली तो यह कि बलात्कार या महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा जैसी घटनाओं को रोकने के लिए रोकथाम के प्रयास जिस सघन तरीके से होने चाहिए थे, वे अब तक नहीं हुए हैं। दूसरी, दिल्ली की घटना के बाद एक करोड़ रुपये से 'निर्भया कोष' की स्थापना की गई थी, ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके, लेकिन उस पैसे को खर्च नहीं किया गया।

तीसरी वजह यह है कि जब भी इस तरह की कोई घटना होती है, तो उसके बाद ही सुरक्षात्मक उपाय किए जाते हैं, जबकि ऐसी घटनाओं से पहले रोकथाम के उपाय विकसित किया जाना चाहिए। मसलन, संवेदनशील जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना, पुलिस गश्त बढ़ाना आदि। चौथी बात, चाहे कानून के क्रियान्वयन की वजह से हो या किसी अन्य वजह से, समाज में या सरकारी तंत्र में अब तक भय का वैसा माहौल नहीं बन पाया है, जो यौन हिंसा की घटनाओं को हतोत्साहित कर सके।

पांचवीं बात, जिस तरह से दिल्ली की बलात्कार की घटना के बाद पूरे देश में व्याप्त आक्रोश को देखकर त्वरित न्याय की व्यवस्था की गई थी, वैसी त्वरित न्याय व्यवस्था बलात्कार के अन्य मामलों के लिए नहीं की जा सकी है। इन सब कारणों से यह संदेश भी गया है कि सबके मामले में इतनी सख्ती नहीं होगी, यही वजह है कि लगातार ऐसी घृणित घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

देश के पूर्वोत्तर एवं पश्चिम बंगाल के इलाके में पहले सामूहिक बलात्कार जैसी वारदात लगभग नहीं होती थी, क्योंकि वहां मातृसत्तात्मक समाज और महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव रहा है। लेकिन हाल के दिनों में वह इलाका भी पुरुषों की इस विकृत मानसिकता का शिकार हो रहा है। इसकी वजह है कि देश भर के समाज में तेजी से यह विकृत मानसिकता पनप रही है।

समाज में जब भी अशांति फैलती है, तो महिलाओं को ही पुरुषों की विकृत मानसिकता का शिकार होना पड़ता है, चाहे युद्ध की स्थिति हो, या जातिगत-सांप्रदायिक विद्वेष की, या फिर आपसी रंजिश की। मुजफ्फरनगर दंगे को ही लें, वहां भी दंगे के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार हुए हैं। कुछ मामलों में ऐसी घटनाओं को राजनीतिक वर्ग भी उकसाता है, क्योंकि राजनीतिक वर्ग के लोग भी ऐसी घटनाओं में शामिल हैं। राजनीतिक वर्ग का काम है, देश को और समाज को नई दिशा देना, लेकिन हमारे देश का मौजूदा राजनीतिक वर्ग खुद ऐसी कई घटनाओं में संलिप्त है।

जहां तक समाज की बात है, तो ऐसी घटनाओं को रोकने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन अफसोस कि समाज की मानसिकता में उस तरह से परिवर्तन नहीं हो रहा है, जैसा होना चाहिए। बेशक ऐसी घटनाओं के बाद गुस्सा देखा जाता है, लेकिन पीड़िता एवं उसके परिजनों के प्रति सामाजिक नजरिये में बहुत बदलाव नहीं आया है।

कोलकाता गैंगरेप मामले की पीड़िता का ही उदाहरण लें, तो उसे सामाजिक दबाव में उस जगह को छोड़कर दूसरी जगह किराये के घर में जाकर रहना पड़ा, जहां पीड़िता को कथित तौर पर बलात्कार में शामिल दो आरोपियों ने जला दिया। इसके अलावा, मैंने ऐसे मामले देखे हैं, जब पीड़िता या उसके परिजन मामलों को परिणति तक पहुंचाने से पहले ही, चाहे जिस भी कारण से हो, पीछे हट जाते हैं, जिसके चलते दोषियों को सजा नहीं मिल पाती।

हालांकि हाल के वर्षों में महिलाओं में अपने अधिकारों और अपने सम्मान के प्रति जागरूकता बढ़ी है और वे खुलकर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताने लगी हैं। इस कारण भी पहले से ज्यादा रिपोर्टें दर्ज हो रही हैं, लेकिन यह नहीं कह सकते कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है या स्थिरता दिख रही है, बल्कि ऐसी घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। समाज की नैतिकता का स्तर कितना गिर गया है कि छोटी-छोटी बच्चियां तक सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं।

इसलिए अब यह जरूरी-सा लगता है कि कानून को इस तरह लागू किया जाए कि ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोगों में भय पैदा हो। इसके लिए त्वरित न्याय व्यवस्था की स्थापना करनी होगी और देश भर में ज्यादा से ज्यादा फास्ट ट्रैक अदालतें बनानी होंगी। अरसे से हम लोग यह मांग करते रहे हैं कि देश के हर जिले में क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर स्थापित किए जाएं। और सबसे बड़ी बात है कि परिवार, समाज एवं स्कूलों में बच्चों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाए। सबको सामूहिक जिम्मेदारी के साथ इस दिशा में आगे बढ़ना होगा, तभी इस संकट को खत्म किया जा सकता है, अन्यथा यह प्लेग की तरह हर परिवार की बेटियों को अपना शिकार बनाएगा।
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