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इनका कुसूर क्या है

Tue, 06 Aug 2013 08:30 PM IST
गिरिराज किशोर
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इस दर्द को राजनीतिज्ञ और शैक्षिक जगत के लोग उतना नहीं समझते, जितना नौकरीपेशा जानता है। निलंबन हालांकि वहां भी होते हैं, पर बहुत कम। जितना कम दायित्व, उतने कम निलंबन। विगत 28 जुलाई को रात एक बजे एक महिला आईएएस अधिकारी को, जिसने पहली बार पद-ग्रहण किया था, निलंबन आदेश टेलीफोन पर मुख्यमंत्री कार्यालय की आईएएस सचिव द्वारा भेज दिया गया। शायद इसमें चंद मिनट लगे। एक बजे निलंबित होने वाले अधिकारी ने अपनी रपट जिलाधिकारी को भेजी। उन्होंने तत्काल कार्मिक विभाग को भेज दी और कुछ ही समय बाद सुश्री अनीता सिंह ने फोन पर निलंबन का आदेश जारी कर दिया।
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एक अधिकारी जब पहली बार अपना पद ग्रहण करता है, तो वह अपने जमीर और दायित्व के प्रति उत्साह के साथ और जी-जान लगाकर काम करता है। जिस अधिकारी का यहां जिक्र हो रहा है, उसका नाम सुश्री दुर्गा शक्ति नागपाल है। उनकी छह सितंबर, 2012 को गौतमबुद्ध नगर में एसडीएम पद पर संभवतः पहली नियुक्ति हुई थी। वहां रेत खनन-माफिया सिंडीकेट बहुत मजबूत है। कहा जाता है कि उसने यमुना की बाढ़ रोकने के लिए यमुना बांध तक काट डाला। पंटूल पुल का निर्माण कर दिया। सरकार चुपचाप देखती रही। लेकिन दुर्गा शक्ति नागपाल ने उससे अकेले टक्कर ली। उन्होंने पंटून पुल तुड़वा दिया। अपने दस महीने के कार्यकाल में उन्होंने रेत माफिया के खिलाफ 509 छापे मारे यानी लगभग 1.6 छापे प्रतिदिन का औसत हुआ। 480 डंपर जब्त किए और 6,78000,76, रुपये राजस्व जुर्माना वसूल किया।

बताया जा रहा है कि 10 महीने में एक अधिकारी द्वारा यह रिकॉर्ड वसूली है। सरकार को, लगता है, अपनी इस मुफलिसी में, इस वसूली के मरहम से ज्यादा महत्वपूर्ण रेत माफिया की तकलीफ महसूस हुई। निलंबन दंड नहीं है, पर यह एक जूते की तरह है, जिसे प्रशासन फेंककर मारता है और अधिकारी का उत्साह और उसकी कार्यक्षमता टूटकर बिखर जाती है।
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बताया जाता है कि एक आईएएस अधिकारी के निलंबन की प्रक्रिया तय है। मसलन, उसकी शिकायत होने पर विधिवत जांच होनी चाहिए। यह जांच वरिष्ठ अधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए। सरकारी जांच एजेंसी की रिपोर्ट पर ही कोई कार्रवाई संभव है। निलंबन से पहले भी आरोपपत्र दाखिल करना जरूरी है। हालात देखने से पता चलता है कि जितने कम समय में निलंबन की यह कार्रवाई हुई, उसमें उपरोक्त में से शायद ही कोई औपचारिकता पूरी की गई हो। निलंबन का जो आधार बताया गया है, वह है, एक मस्जिद की दीवार गिराने का आरोप। बताया जाता है कि वह मस्जिद नेताओं के इशारे पर ग्राम समाज की जमीन पर बनाई जा रही थी। चार दिन पहले गांववालों ने एसडीएम से शिकायत की थी। उन्होंने अवैध निर्माण गिराने के निर्देश दिए थे। सवाल है कि क्या गांव के लोगों की शिकायत पर अवैध निर्माण गिराने का आदेश देना एसडीएम के अधिकार में था? क्या अधिकारी के खिलाफ जिलाधिकारी ने सरकार को रिपोर्ट दी? या कोई जांच हुई? चूंकि अब मामला न्यायालय में है। ऐसे में, कानूनी पक्ष पर वहीं विचार होगा।

सरकार में निलंबन तो अक्सर होते रहते हैं। लेकिन इस घटना ने मुझे विशेष रूप से इसलिए आकर्षित किया, क्योंकि नागपाल की यह पहली पोस्टिंग थी। सरकार संवेदनामुक्त संस्था होती है। युवा अफसर जब सेवा में आते हैं, तो उनमें देश और समाज के प्रति प्रेम होता है और वे दायित्व भी महसूस करते हैं। समाज में नौकरशाही के खिलाफ बनी छवि को सुधारने का जज्बा भी उनमें होता है। वर्ष 1975 में जब मैं आईआईटी, कानपुर में रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त हुआ, तो दो साल बाद ही मुझे भी निलंबन भोगना पड़ा था। दरअसल आईआईटी मिनी अमेरिका कहलाता है। वहां अंग्रेजी का गहरा प्रभाव था। जब उन्हें पता चला कि मैं हिंदी का लेखक हूं, तो वहां मेरे खिलाफ वातावरण बनना शुरू हो गया। डाइरेक्टर ईमानदार थे, पर कान के कच्चे थे। मेरे खिलाफ उन्हें इतना भर दिया गया कि मेरे विरुद्ध बेबुनियाद आरोप गढ़े जाने लगे। अंततः मुझे निलंबित कर दिया गया। जो आरोपपत्र दिए गए, उनमें कोई भी आरोप आर्थिक अनियमितता का नहीं था। मैं ये बातें इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैं भी उत्साह के साथ आया था। मेरा मानना था कि मातृभाषा को भले प्रमुख जगह न मिले, पर उसकी उपेक्षा न हो। मैं चाहता था कि बड़े-बड़े विद्वान आर्थिक अनियमताओं के चक्कर में न पड़ें। अंततः मुझे इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय जाना पड़ा। वहां मैं जीता और रजिस्ट्रार के पद पर लौटा।

मेरे दादा अंग्रेज कलक्टर की कहानी बताते थे। वह कलक्टर हमेशा कहता था, अगर प्रशासन चलाना है, तो पहले दंड से शुरू न करो, क्षमा से करो। क्योंकि यह मानकर चलो कि नया अधिकारी न सरकार की नीति को समझता है, न प्रशासन की चालों को। उसे पहली गलती पर समझाओ, दूसरी पर जरूरत पड़े, तो डांटो, तीसरी-चौथी पर जवाब मांगो। शुरू से ही अगर मारोगे, तो वह स्कूल में रोज पिटने वाले बच्चे की तरह पढ़ना-समझना बंद कर रट्टू तोता हो जाएगा।

नागपाल का निलंबन मेरे निलंबन से मेल खाता है। अगर खनन का मामला न होता, तो खनन के विरुद्ध आवाज उठाने वाले एक किसान का नागपाल के निलंबित होते ही बेदर्दी से कत्ल न किया गया होता। खनन की बात सीधे स्वीकार की नहीं जा सकती, तो सांप्रदायिकता का भूत खड़ा कर एक ईमानदार अफसर का भविष्य बिगाड़ने की तरकीब निकाल ली गई। जबकि प्रदेश में दंगे होते हैं और सरकार को इसका अंदाज रहता है, लेकिन पहले तो पहले, बाद में भी कार्रवाई नहीं होती।
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