दिल्ली में ताजा-ताजा चुनाव जीत चुकी आम आदमी पार्टी इतना भी ऊंचा न कूदे कि ठीक से चाल चलना भूल जाए। इस बार वे पिछली बार की तुलना में कुछ बदले-बदले से हैं। कई तो भीतर से इतने खुन्नस में हैं कि इस छप्पड़फाड़ जीत का धन्यवाद देने की जरूरत भी महसूस नहीं की। जबकि कुछ अदृश्य से लगते हैं।
हालांकि मंत्री लोग लाल बत्ती वाली बड़ी गाड़ियों में, प्रस्तावित बंगलों में, सुरक्षा घेरे में, तथा अन्यान्य सुख-सुविधाओं से संपन्न हो गए। इस बार त्याग की ऐसी कोई घोषणा भी नहीं थी, हां, शपथ ग्रहण के दौरान-इंसान का इंसान से हो भाईचारा वाला गाना इस बार भी जरूर गाया गया। इसके बाद अगर जनता दरबार में जन समस्याएं निपटाने के लिए, जन समूहों के सामने छत की मुंडेर या बालकनी से संबोधित करने को कैमरोचित तमाशा न होने दिया जाए, तभी आम आदमी को लगेगा ही कि वह भीतर-बाहर से सरकार का हो गया।
इसी तरह रालेगण सिद्धि के संत अन्ना जी की, जिन्होंने दिल्ली के नजदीक ही अपनी कुटी छवा ली है, सलाहों को जीवन में उतारने की जरूरत पड़ेगी कि सादगी बनाए रखनी है, जनता से दूरी नहीं रखनी है। नहीं तो पार्टी में अहंकार की फफूंद लगते भला क्या देर लगेगी? दो अंगुल प्रमाण की 'वी' वाली विक्ट्री यानी विजय चिह्न दिखाकर मुस्करा देने से काम नहीं चलने वाला।
कहते हैं कि अब यह राजधानी के बाहर अपनी जमीन तैयार करने के बारे में सोच रही है। दिल्ली के बाद बिहार में नीतीश कुमार ने कुर्सी छोड़ने के लिए ठीक केजरीवाल स्टाइल में जनता से माफी मांगी है। इसके बावजूद यह आने वाले समय में पता लगेगा कि बाहर कहां-कहां झाड़ू चलने की संभावना है, बिहार के दियारे में, पश्चिम बंगाल की मां-माटी-मानुष की धरती पर या उत्तर प्रदेश की सरजमीं में या पांच नदियों के पंजाब में? पर पहले यह दिल्ली में तो अपना होना साबित करे। बढ़ते तापमान के इन दिनों में बिजली-पानी जैसे कई मुद्दे हल होने के इंतजार में हैं। कुछ करके दिखाना होगा, अबकी इस्तीफा देने की तो सोचना भी मत।