जब से नरेंद्र मोदी ने छप्पन इंच के सीने की बात की है, भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बहुत गंभीर चुनौती नजर आने लगी है। अब भला ऐसे मजबूत नेता कहां से लाएं, जिनका सीना छप्पन इंच चौड़ा हो? जांचने जाएं, तो राजनीति में आए पहलवानों का सीना भी इससे कम ही निकलेगा। मोदी साहब, कृपया उनकी मजबूरी भी समझिए। ऐसे चौड़े सीने की जरूरत तो फौज में पड़ती है, क्योंकि वहां सीने पर गोली खाने का रिवाज है।
अब चूंकि राजनीति में खाने के लिए गोली को छोड़कर अन्य बहुत सारी चीजें हर समय उपलब्ध हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि यहां छप्पन इंच के सीने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए बाकी नेता चाहें, तो इस मुद्दे पर पार्टी लाइन से परे एकजुट होकर मोदी के खिलाफ झंडा बुलंद कर सकते हैं।
वे कह सकते हैं कि छप्पन इंच सीने के बगैर भी सीना तानकर चलने में उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं होती। यही नहीं, वे एकजुट होकर यह प्रस्ताव भी पारित कर सकते हैं कि राजनीति में छप्पन इंच के सीने की कोई उपयोगिता ही नहीं है।
तमाम आलोचनाएं झेलने, लगातार विरोध प्रदर्शनों और असंसदीय शब्दों से विभूषित किए जाने के बावजूद अगर हमारे माननीय नेताओं में सीना तानकर चलने का आत्मविश्वास दिखता है, तो यह छप्पन इंच के सीने की निरर्थकता का ही एक बड़ा सुबूत है। सत्ता में रहने पर हमारे माननीय नेतागण क्या कुछ नहीं करते? इसी तरह शिकंजे में फंसने पर वे अस्पताल में भर्ती हो जाने से लेकर खुद को निर्दोष बताए जाने तक क्या कुछ नहीं करते-कहते? फिर खामख्वाह राजनेताओं के लिए ऐसी शारीरिक योग्यता की जरूरत क्यों बताई जा रही है, जिसकी आवश्यकता फौज में ही पड़ती है?
सवाल यह भी है कि छप्पन इंच चौड़ा सीना लेकर कोई नेता क्या कर लेगा। जितना समय और जितनी ऊर्जा वह अपने सीने को छप्पन इंच करने में गंवाएगा, उतने वक्त में तो उसका विरोधी नेता सांसद, विधायक या मुख्यमंत्री बन जाएगा। केजरीवाल ने बता दिया है कि साल भर की राजनीति में भी मुख्यमंत्री बना जा सकता है और उस पद से इस्तीफा देकर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बरक्स खड़ा हुआ जा सकता है। मोदी के मानक का आधा सीना लेकर भी अगर कोई नेता उनसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है, तो फिर छप्पन इंच सीना मोदी साहब को ही मुबारक।