अन्ना हजारे ने सितंबर, 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अनशन किया था, वह लोकपाल विधेयक के पक्ष में आंदोलन चलाने का आधार बना। पिछले दिनों संसद के दोनों सदनों ने इसे पारित भी कर दिया। लोग यह मान चुके हैं कि लोकपाल से भ्रष्टाचार खत्म होगा। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। खुद अन्ना हजारे भी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगेगा, लेकिन यह कम जरूर होगा।
वर्तमान में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार कॉरपोरेट जगत कर रहा है। इसके सामने न्यायपालिका, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं मीडिया आदि का भ्रष्टाचार छिप गया। जबकि राजनीति का भ्रष्टाचार ज्यादा दिखता है। चूंकि उसके जनप्रतिनिधि जनता से चुनकर आते हैं, इसलिए उनसे अपेक्षाएं ज्यादा हो जाती हैं। जब वह लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता या गलत स्रोतों से पैसा बनाता है, तो एक भ्रष्टाचारी के तौर पर उसकी शिनाख्त आसान हो जाती है। दूसरी ओर, एक व्यक्ति अपनी जिंदगी में शून्य से व्यापार शुरू करता है और वह एक दिन बहुत अमीर आदमी बन जाता है। क्या उसकी अमीरी कठिन परिश्रम, तेज दिमाग और अवसर का ही प्रतिफल होता है? जाहिर है, हर मामले में ऐसा नहीं होता।
देश में कठिन परिश्रम करने वालों, ईमानदारों और तेज दिमाग वालों की कमी नहीं। वे धनाढ्य क्यों नहीं बन जाते? साफ है कि कॉरपोरेट जगत में तरक्की की सीढ़ियां केवल ईमानदारी से नहीं चढ़ी जा सकतीं। लेकिन लोकपाल इस भ्रष्टाचार को नहीं देख पा रहा। क्या बिना इस भ्रष्टाचार से लड़े उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है?
जहां तक न्यायपालिका की बात है, तो लोकतंत्र के दूसरे स्तंभों की तुलना में यह ज्यादा पारदर्शी और ईमानदार तो है ही, इसलिए आम जनता की उम्मीदों का आखिरी केंद्र भी है। लेकिन न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश तक स्वीकार कर चुके हैं।
इसी तरह यह कौन नहीं जानता कि ज्यादातर एनजीओ खाने-पीने और प्रतिष्ठा के माध्यम बन गए हैं? अनेक गैर सरकारी संगठनों का काली सूची में आना ही यह साबित करता है कि वे पाक-साफ नहीं हैं। इसी तरह मीडिया में कई ऐसे पत्रकार हैं, जो सैकड़ों करोड़ के आसामी हैं। क्या वे यहां तक परिश्रम और वेतन के कारण पहुंचे हैं? विडंबना यह है कि जनता राजनेताओं के भ्रष्टाचारों के बारे में बहुत जानती है, लेकिन इन संस्थाओं के भ्रष्टाचार से अनभिज्ञ है। अन्ना हजारे से लेकर अरविंद केजरीवाल तक ने बड़ी निपुणता से अधिकारियों एवं नेताओं के भ्रष्टाचार के प्रति जनता का रोष मोड़ दिया। जबकि उन्हें कॉरपोरेट जगत, मीडिया और एनजीओ में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी आंदोलन चलाना चाहिए था।
जब 2011 में अन्ना हजारे अनशन कर रहे थे, तब अनुसूचित जाति/जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ की ओर से एक समानांतर रैली निकालकर हमने उनसे सवाल किया था कि जनलोकपाल विधेयक में उद्योग जगत, मीडिया एवं एनजीओ के भ्रष्टाचार को शामिल क्यों नहीं किया जा रहा। उस पर वह चुप थे।
जब लोकपाल विधेयक पारित हो रहा था, तब राज्यसभा में माकपा सांसद सीताराम येचुरी ने क्लॉज-14 के तहत वोट करवाया कि एनजीओ, कॉरपोरेट घराने और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को इसमें क्यों नहीं शामिल किया जा रहा? प्रस्ताव पर 19 मत पड़े। विद्रूप देखिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाए जाने में सबसे ज्यादा सहयोग कॉरपोरेट जगत, मीडिया एवं एनजीओ का ही रहा है। उद्योग जगत के लिए आराम की बात यह है कि इससे नेता और अधिकारी कमजोर पड़े हैं। जो विकसित देश भारत की आर्थिक तरक्की को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे, उन्होंने एनजीओ आदि के माध्यम से इस आंदोलन को समर्थन दिया।
जाहिर है, जो लोकपाल बना है, उसमें जनलोकपाल के तमाम तत्व शामिल नहीं हो पाए हैं। लेकिन अरविंद केजरीवाल को इसे जोकपाल कहने का हक इसलिए नहीं है, क्योंकि एनजीओ, मीडिया और कॉरपोरेट जगत के भ्रष्टाचार को जनलोकपाल में शामिल करने की जरूरत पर वह भी चुप्पी साधे हुए थे। जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई आधी-अधूरी तैयारी से नहीं हो सकती। इसलिए लोकपाल विधेयक का पारित होना उम्मीद की वजह नहीं हो सकता।