नीलिमा डालमिया ने बा की डायरी पढ़कर शायद यह निष्कर्ष निकाला कि बापू पुरुष वर्चस्व के समर्थक और तानाशाह थे। वह कस्तूरबा के शरीर, मन और विचारों पर नियंत्रण रखने पर तुले थे। यह सही है कि बापू नवविवाहिता पत्नी को हर समय साथ रखना चाहते थे। वह कस्तूरबा को अपने से अधिक देर तक दूर नहीं रखना चाहते थे। कस्तूरबा घर की सबसे छोटी बहू थी। वह दिन भर रसोई और घर के कामों में व्यस्त रहती थी। एक और जरूरी बात-बापू चाहते थे कि अपनी अनपढ़ी पत्नी को रात में पढ़ाएं।
यह सही है कि मोहनदास ने कस्तूर से कहा कि तुम पूछकर कहीं जाया करो। उस जमाने में कुछ बंदिशें तो थीं। उनके पिता का जिस समय देहांत हुआ, तो विचित्र घटना हुई। मोहनदास उनकी सेवा में थे। तभी उनके चाचा तुलसी दास आ गए। वह बोले, तुम जाओ, मैं हूं दादा के पास। मोहनदास अपने कमरे में गए। इतने में पुराने नौकर ने दरवाजा खटखटाया और कहा, बापू नहीं रहे। मोहनदास कपड़े संभालते हुए भागे। वह शर्मसार थे। जीवन भर पिता की सेवा की, लेकिन जब वहां होना चाहिए था, तब गैरहाजिर। जीवन भर यह शर्मिंदगी उन्हें सालती रही।
वैसे सब पतियों की तरह मोहनदास भी शुरू में अधिकार प्रिय थे। अधिकार की प्रवृत्ति ईर्ष्या को जन्म देती है। कस्तूर से वह शपथ लेने को कहते कि वह उनके प्रति समर्पित रहेगी। कस्तूर सोचती थी कि वह मोहनदास के अलावा किसके प्रति समर्पित रह सकती है। एक सवाल कस्तूर को परेशान करता था कि उसके पति को कौन सिखा रहा है। जब मोनिया ने मित्र मेहताब की संगत में मांस खाना शुरू किया, तो उसके शरीर की गंध बदल गई थी। कस्तूर को लगने लगा था कि कहीं उसके पति ने मेहताब की संगत में वर्जित चीजें खाना तो आरंभ नहीं कर दिया। आत्ममंथन मोनिया के मन में भी चल रहा था। प्रतिदिन देर से आना और भोजन न करने के लिए बहाने बनाना उन्हें कचोटता था।
एक रुचिकर घटना है। सुभाषचंद्र बोस आईसीएस की परीक्षा देने के बाद जब भारत आए, तो सबसे पहले वह गांधी जी से मिलने आश्रम गए। सुभाष बाबू चाय पीते थे। आश्रम में चाय प्रतिबंधित थी। बा उन्हें रसोई में बुलाकर चाय पिला देती थीं। एक दिन जब बा चाय दे रही थीं, तो बापू आ गए। वह बोले, आश्रम में चाय पर प्रतिबंध है। बा ने जवाब दिया कि सुभाष अतिथि हैं। उन पर प्रतिबंध लागू नहीं होता। बापू कस्तूर की तरफ देखने लगे। कस्तूरबा ने कहा, रसोई पर मेरा अधिकार है। बापू चुपचाप चले गए।
बहुत गलत बातें बापू के बारे में फैलाई जा रही हैं। जैसे बा के तानाशाह पति ने पेनसिलिन का इंजेक्शन नहीं लगाने दिया। मैंने अपना बा उपन्यास काफी जांच-पड़ताल के बाद लिखा है। जब बापू के सामने यह मसला आया, तो उन्होंने देवदास से कहा, मैं इस पक्ष में नहीं। आप लोग सलाह कर लें। अगर सबकी मर्जी है, तो लगवा दीजिए। कस्तूरबा जीवन के अंतिम पहर में है। डॉक्टर से भी बात की गई। उसने कहा कि इंजेक्शन कितना कारगर होगा, यह निश्चित नहीं। तब उन्होंने कहा कि व्यर्थ उनका शरीर न बिंधवाएं। यह सबका संयुक्त निर्णय था कि इंजेक्शन न लगवाया जाए। देवदास उनके सबसे छोटे बेटे थे, तीसरे नहीं। तीसरे रामदास थे। मैंने हरिलाल को बा द्वारा जेल से लिखा पत्र बा उपन्यास में दिया है। वह पढ़कर यह भ्रांति दूर हो जाएगी कि हरिलाल के बारे में वह क्या सोचती थीं। जब गांधी भारत आ रहे थे, तो उन्होंने बा से कहा कि मैं चाहता था, हरिलाल दक्षिण अफ्रीका का गांधी बने...।