उत्तर प्रदेश समेत देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। तमाम राजनीतिक पार्टिंयों की साख दांव पर लगी है। चुनाव से पहले ठहरकर थोड़ा-सा यह भी सोच लें कि लोक को इन चुनावों से क्या मिलने वाला है? लोक में भी तरह-तरह के लोग हैं-कुछ संपन्न, कुछ दरिद्र, कुछ इस जाति के, कुछ उस जाति के, कुछ अगड़े, कुछ पिछड़े, कुछ शहरी, कुछ गंवई और कुछ ऐसे भी, जिन्हें चुनाव से लेना-देना नहीं। क्या लोग चुनावों में अपनी नियति लिखने में सफल होंगे? या फिर उनकी नियति कोई और लिख रहे हैं, और उन्हें लिखने वालों में से किसी एक का चयन करना है?
एक तरफ राजनीतिक दलों के खेमे ताल ठोक रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जो किसी खेमे में नहीं हैं, स्वतंत्र हैं, लेकिन वे कुछ कहना चाहते हैं। वे लोगों के बीचअपनी बात उठाना चाहते हैं। पर वे थोड़ा कुछ भी करना चाहें, तो आचार संहिता आड़े आती है।
आचार संहिता बनाने के पीछे दो कारण तो प्रत्यक्ष हैं। पहला, लोगों में सदाशयता बनाए रखना और दूसरा हर उम्मीदवार को बराबरी का मैदान प्रदान करना। सदाशयता तो एक हद तक बनी रहती है। जाति और धर्म से जुड़े आक्षेप दबे स्वर में तो चल जाते हैं, पर बड़बोले आक्षेपों से उम्मीदार बचते दिखाई देते हैं। कोई अनर्गल बोलता है, तो उसके खिलाफ शिकायत दर्ज होने पर कार्रवाई चुनाव के बाद तक चलती रहती है। कुछ ऐसा-वैसा बोलकर बात वापस लेने, या मीडिया पर भ्रमित करने का बहाना लगाकर नेता लोग निकल जाते हैं। बोली में सदाशयता कितनी है, यह व्यक्तिगत विवेक का विषय है। इसके लिए कोई कानून नहीं बन सकता, न ही बनना चाहिए। लोकतंत्र का एक सिद्धांत यह माना जाता है कि विपक्ष मजबूत होना चाहिए। पर 'कांग्रेस मुक्त भारत' की बात की ही जा रही है।
सदाशयता निजी गुण है और सामाजिक भी। समाज में सदाशयता कम होती है, राजनीति में और कम। वह इसलिए कि राजनीति दूसरे को परास्त कर विजय प्राप्त करने का खेल बन गई है। राजनीतिक दल यह खेल आपस में खेलते हैं और लोग उसमें हिस्सा लेने लगते हैं। अब खेल के नियम हों भी, तब धक्का जान-बूझकर लगा या टंगड़ी अनजाने में लगी, नहीं कहा जा सकता। शायद राजनीति खेल से भी बदतर स्थिति में पहुंच चुकी है, जब खिलाड़ी खेमा बदल कर दूसरे खेमे में जा अपने ही लोगों से लड़ने लगता है। राजनीति में लोग आजकल उस खेमे को वोट देने लगे हैं, जो ज्यादा उज्ज्वल, वाक्पटु हो, जिससे मन जुड़ जाता हो। आज लोग बातें ज्यादा करते हैं और राज की नीति की व्याख्या करते कम ही नजर आते हैं। यह मीडिया का प्रभाव है। आदर्श आचार संहिता से लोगों में दृष्टिकोण बदलने की ताकत होनी चाहिए, ताकि लोग सही दिशा में सोचें, नीति-अनीति का विचार करें, रंग-बिरंगे वस्त्रों के प्रदर्शन और चुलबुली बातों से विलग हों। पर ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता।
गुजरे जमाने में विरोधी खेमे की नीतियों की आलोचना अधिक होती थी, व्यक्तिगत कमजोरियों की कम। अब किसी भी कीमत पर विकास का जमाना है, चाहे लोगों से उनके संसाधन ही क्यों न छीन लिए जाएं। बहस होती भी है, तो मालूम नहीं पड़ता कि उसमें सार्थक क्या है, वह शोर सुनाई देती है। अनंत शोर। विकास का समस्त ज्ञान पृथ्वी को नष्ट कर मृत्यु के पास ले जा रहा है, प्रभु के पास नहीं। विचार और कर्म का अनंत चक्र शोर में तब्दील हो रहा है, शून्य में नहीं, शब्द का ज्ञान फैल रहा है, शब्द ब्रह्म का नहीं। यह ऐसा विकास है, जिससे देश में अध्यात्म ही नष्ट हो रहा है। इस विकास को हर खेमे की स्वीकृति प्राप्त है।
विकास के इस शोर और दंभ में लोग इस खेमे को चुनें या उस खेमे को, क्या फर्क पड़ता है? जब सभी खेमे समस्त संहिताओं को नष्ट करने पर तुले हों, तब आचार संहिताएं भी भला क्या कर सकती हैं? इन खेमों से अलग कोई राजनीति में अपना स्थान बनाए, समय गुजरने के साथ ऐसा मुश्किल होता जा रहा है।
बड़े खेमों के नेता तो टेलीविजन और अखबारों के जरिये, इंटरनेट में बहकर घरों और स्मार्टफोन में आ घुसते हैं। वे स्वयं, उनकी सूक्तियां, लड़ाई-झगड़े, यहां तक कि गाली-गलौज भी लोगों और उनके बच्चों को अपनी बातों से सराबोर कर देते हैं। पर खेमे से बाहर के लोग अपनी बात कैसे-कहां कहें!
आचार संहिता हरेक उम्मीदवार को बराबर का मौका नहीं देती। जो लोग खेमे में नहीं हैं, उनकी खबर तो लोकल केबल भी नहीं चलाता, क्योंकि इसकी टीआरपी नहीं। सबसे सस्ता उपाय बैनर और पोस्टर लगाने का है। यों सारे साल पोस्टर शहर में लगे मिल जाते हैं, पर चुनाव में पोस्टर बंद। अगर आप महत्वपूर्ण हैं, तो खबरों में हैं, लेकिन अगर किसी खेमे में नहीं हैं, तो घर-घर घूमते रहिए। आचार संहिता खर्च पर तो लगाम लगा नहीं पाती, क्योंकि खेमा कितना भी खर्च कर सकता है, वह उम्मीदवार के खर्च में नहीं जुड़ता। पर दो रुपये के पोस्टर पर लगाम कस जाती है! बड़े खेमे वाले भी पोस्टर-बैनर से बहुत डरते हैं। मान लीजिए, शहर के बड़े चौराहे पर सवाल उठाता बड़ा-सा पोस्टर या बैनर लगा हो कि ‘क्या किसान को मेहनत का दाम मिलता है,’ या ‘क्या मजदूर सच में जिंदा है,’ या ‘क्या अच्छे दिन आ गए?’ या ‘हमारे समाज को कौन तोड़ रहा है, तो खेमे वालों को मुश्किल होने लगेगी। फिर राजनीतिक खेमों के बाहर के लोग अपनी आवाज कैसे, कहां बुलंद करें? आदर्श आचार संहिता राजनीतिक खेमों के हित में खेमे से बाहर के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार करती प्रतीत होती है।
मीडिया में खेमों के विकास संबंधी ज्ञान की इतनी भरमार या मारामारी है कि पोस्टर का अंतर्ज्ञान छूट रहा है। पोस्टर में वह जीवन है, जो जीने में छूटा जा रहा है। आचार संहिताएं आखिर किसके लिए और क्यों बन रही हैं, यह पोस्टर पूछ सकता है, जिससे सभी खेमे डरते हैं।
लेखक गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के निदेशक हैं।