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कैसा पाकिस्तान चाहते हैं शरीफ?

Tue, 11 Jun 2013 09:03 PM IST
महेंद्र वेद
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नवाज शरीफ ने तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाल लिया है, लेकिन क्या वह भाग्यशाली साबित होंगे? उनके और पाकिस्तान के भविष्य का संकेत तीन बातों से मिल सकता है।
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पहला संकेत तो यह कि जब वह सपरिवार शपथ ग्रहण के लिए जा रहे थे, तो उनके काफिले को सेना के एक जवान ने सिर्फ इसलिए रोक दिया, क्योंकि वहां से उस वक्त सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी का काफिला गुजरने वाला था।

बेशक यह मामूली दुर्घटना है, लेकिन यह संकेत है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, वहां की सेना अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगी।

वह वहां के सत्ता-ढांचे का हिस्सा है। शरीफ और सेना, दोनों को साथ-साथ काम करना सीखना होगा, अन्यथा तीन बार सैन्य तख्तापलट का गवाह रहे पाकिस्तान में ऐसा चौथी बार भी हो सकता है।
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शरीफ ने कहा था कि प्रधानमंत्री पाकिस्तानी सेना का बॉस होगा, पर उन्हें सेना को कमजोर करने की कोशिश से बाज आना होगा।

दूसरा संकेत सौभाग्यवश दीर्घकालीन अर्थ में पहले संकेत के विपरीत है। शरीफ के खिलाफ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मखदूम अमीन फहीम और तहरीक-ए इंसाफ के मखदूम जावेद हाशमी ने चुनाव लड़ा था।

इन तीनों ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान के लिए आगे की राह लोकतंत्र ही है। फहीम ने सहयोग का वायदा किया है, पर सवाल है कि पाकिस्तान की सियासी पार्टियां, जो आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ लड़ती रहती हैं, अतीत से सबक लेकर सेना को सबक सिखा सकती है। यह तो समय ही बता पाएगा।

तीसरा संकेत भारत की तरफ से है। जिस दिन शरीफ शपथ ग्रहण कर रहे थे, उसी दिन हमारे गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने आईएसआई पर भारत के पंजाब एवं अन्य हिस्सों में सिख आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था।

जाहिर है, भारत पाकिस्तान के क्षितिज पर छाया रहेगा। हालांकि शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते बेहतर बनाने के संकेत दिए हैं, पर कयानी द्वारा भारत के साथ संबंधों में चेतावनी बरतने की सलाह के बाद स्पष्ट है कि समझदारी दिखाने के लिए उन्हें पहले की योजना को दरकिनार करना होगा।

स्पष्ट शब्दों में कहें, तो शरीफ शायद ही इस स्थिति में होंगे कि वह भारत के खिलाफ आतंकवाद के खात्मे के अपने वायदे को पूरा कर सकें। खासकर तब, जब घरेलू आतंकवाद पर अंकुश लगाने में ही पाकिस्तान को मुश्किल हो रही है।

इसी तरह यह भी स्पष्ट नहीं है कि मुंबई हमले में संलिप्त हाफिज सईद जैसे लोगों की सुनवाई को वह कैसे जल्दी निपटाएंगे, जिसे उनके भाई द्वारा शासित पंजाब प्रांत में हीरो माना जाता है।

नहीं भूलना चाहिए कि वह उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं, जहां के हर क्षेत्र में भारत विरोधी तत्व काफी मजबूत हैं।

शरीफ के बारे में कोई भी भारतीय आकलन उनके अतीत पर गौर किए बिना पूरा नहीं होगा। जनरल जिया उल हक के शागिर्द और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री रह चुके शरीफ ने अल्पसंख्यकों और महिलाओं को निशाना बनाने वाले हुदूद एव शुन्ना कानूनों को बढ़ावा दिया।

असल में शरीफ और इमरान खान के 'नया पाकिस्तान' बनाने के नारों ने राजनीतिक दक्षिणपंथ की ओर झुकाव पैदा किया, जिससे अवामी नेशनल जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां पराजित हो गईं।

एक व्यवसायी होने के नाते शरीफ द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हो सकते हैं और भारतीय निवेश को आकर्षित करने की कोशिश करेंगे। मौजूदा स्थिति में भारत-पाक व्यापार मात्र दो अरब डॉलर का है और व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है।

द्विपक्षीय व्यापार को लेकर जम्मू-कश्मीर और भारतीय पंजाब में बेशक थोड़ा उत्साह हो सकता है, लेकिन व्यापक स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने के लिए बैंक गारंटी जैसे सांस्थानिक प्रबंध की कमी है।
 
शरीफ की सबसे बड़ी चुनौती चरमपंथ है, जिसने वहां के समाज का काफी नुकसान किया है। इसने भारत एवं अफगानिस्तान में सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के साथ मध्य एशिया के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक ढांचे को बुरी तरह प्रभावित किया है।

यहां तक कि चीन भी उइघुर मुस्लिम जनजाति को पाकिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण दिए जाने और हथियार सौंपने को लेकर चिंतित है। यही वजह है कि पाकिस्तान पर लगे 'विफल राज्य' के ठप्पे को दूर करने के लिए शरीफ को काफी मेहनत करनी पड़ेगी।

लेकिन उनका खुद का संपर्क लश्कर-ए-जांगवी एवं सिपह-ए-सहबा से रहा है, जो पाकिस्तान में शिया विरोधी और भारत विरोधी है।

नेशनल एसेंबली में शरीफ ने ठीक ही कहा कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। ऊर्जा की गंभीर समस्या है। उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारी राहत पैकेज की जरूरत है, जिसके लिए अमेरिका का समर्थन जरूरी है। अगर शरीफ ने अपना पत्ता ठीक से खेला, तो पाकिस्तान को फायदा हो सकता है।

इस वर्ष वहां राष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं, क्योंकि जरदारी का कार्यकाल सितंबर में खत्म हो रहा है। नवाज किसी ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना चाहेंगे, जो उनके खिलाफ काम न करे, जैसा कि गुलाम इशाक खान ने 1993 में किया था।

कई सेवा विस्तार के बाद नवंबर में कयानी को भी सेवानिवृत्त होना है, अगले सेना प्रमुख के चयन में शरीफ दखल देने का संकेत दे चुके हैं। ऐसा उन्होंने एक बार पहले भी किया था और सफल रहे थे। जाहिर है, सेना सावधान रहेगी।

जाहिर है, नवाज शरीफ के सामने घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई जटिल चुनौतियां हैं। सब कुछ उन्हीं पर निर्भर है कि वह इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं। ये चुनौतियां 63 वर्षीय बुजुर्ग राजनेता के लिए तो और भी कठिन है, जिनमें पहले की तरह सक्रियता नहीं रह गई है।
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