पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमान मलिक शुक्रवार को तीन दिवसीय दौरे पर भारत आ रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों के बीच वीजा नियमों में ढील देने के संबंध में हुए समझौते को अमल में लाया जाना है। इस यात्रा के परिप्रेक्ष्य में रावलपिंडी स्थित विशेष अदालत का हाल जानना भी जरूरी है, जो मुंबई हमले की सुनवाई कर रही है।
अदालत में वहां की संघीय जांच एजेंसी (एफआईए) के दो अधिकारियों ने विगत शनिवार को गवाही के दौरान गुलाबी फोम समेत आतंकी शिविरों से जब्त 350 सामग्रियों का विस्तृत ब्योरा पेश किया है। यह गुलाबी फोम वही है, जो एमवी कुबेर नामक नौका और अजमल आमिर कसाब के सामान में मिली थी।
एफआईए के अधिकारियों ने इन चीजों को लश्कर के कराची, मीरपुर खास और सिंध के दो कैंपों से बरामद किया था। दिलचस्प है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जब भी वार्ता का कोई सूत्र बनता है, तब पाकिस्तान में मुंबई हमले से संबंधित मामलों में हरकत होने लगती है। लेकिन क्या यह हरकत वास्तविक है? अबु जुंदाल के भंडाफोड़ के बाद भारत सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान में आईएसआई के अधिकारी स्वयं इस हमले का नियंत्रण कर रहे थे। लिहाजा यह उम्मीद बेमानी है कि पाकिस्तान मुंबई हमलावरों को सजा देगा।
असल में इसके बीज वहां के प्रजातंत्र में छिपे हैं। वहां की सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि वह सेना और आईएसआई की आंखों में आंखें डालकर बात कर सके। आलम यह है कि वहां पूरे देश में आतंक के कैंप सरेआम चल रहे हैं तथा इन गतिविधियों के लिए चौराहों पर चंदा वसूला जाता है, पर हुकूमत शांत है। हर सप्ताह वहां आतंकी घटनाएं होती हैं और 2001 से आज तक 40,000 पाकिस्तानी जनता इन आतंकियों के हाथों मारी जा चुकी है। लेकिन सरकार इन्हें रोक नहीं पा रही।
दरअसल ये आतंकी कैंप तभी अस्तित्व में आ गए थे, जब अफगानिस्तान पर रूस का कब्जा हुआ करता था। रूसी सैनिकों को वहां से हटाने के लिए अमेरिका ने आतंकी वारदातों के लिए पाकिस्तान को धन मुहैया कराया, और जब रूस ने अफगानिस्तान छोड़ा, तो यही आतंकी तालिबान बनकर उस पर काबिज हो गए। अमेरिका इनके खिलाफ हमला नहीं छेड़ता, अगर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को आतंकी निशाना नहीं बनाते। अब अफगानिस्तान से खदेड़े गए यही आतंकी फिर से पाकिस्तान में सक्रिय हो गए हैं।
पाकिस्तान जानता है कि वह कभी परंपरागत युद्ध में भारत से नहीं जीत सकता, इसलिए वह छद्म युद्ध को बढ़ावा दे रहा है। वह अफगानिस्तान की वही नीति हम पर अपना रहा है, जिसे अमेरिका ने बढ़ावा दिया था। हालात ये हैं कि भारत के खिलाफ लड़ने वाले इन आतंकियों को फौजी की तरह न सिर्फ वेतन दिया जाता है, बल्कि मरने पर उनके परिवारवालों की पूरी मदद करने का भरोसा भी दिया जाता है। इसलिए अगर पाकिस्तान संबंध सामान्य बनाने को लेकर वास्तव में उत्सुक है, तो उसे समझना होगा कि मात्र बातचीत से मसला नहीं सुलझ सकता, कुछ ठोस पहल किए जाने की जरूरत है।
वह बार-बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इसलामाबाद आने का न्योता दे रहा है, परंतु उसने आज तक भारत के विरुद्ध युद्ध करने वाले आतंकियों के खिलाफ दिखावे के लिए ही सही, सकारात्मक कदम नहीं उठाया। हाफिज सईद का खुलेआम नई दिल्ली के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाना इसी की पुष्टि करता है। इसलिए बातचीत का उसका दिखावा ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला।
बहरहाल यहां यह सवाल मौजूं है कि क्या पाकिस्तान का कभी हृदय परिवर्तन होगा। इसका उत्तर 'हां' तभी हो सकता है, जब इसलामाबाद में ऐसी प्रजातांत्रिक सरकार आएगी, जो भ्रष्टाचार से मुक्त होगी और जनता का भरोसा जीतेगी। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि भारत मुंबई हमले को नहीं भुला सकता, और यह खुद उसके हित में है कि वह ऐसे सभी तत्वों के खिलाफ ईमानदारी से कार्रवाई करे, जो भारत में अशांति फैला रहे हैं।
बेशक वीजा नियम में ढील के माध्यम से अथवा अन्य किसी प्रयास से संबंध सुधारने की कोशिशें होनी चाहिए, पर माहौल की अनुकूलता बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि पाकिस्तान आतंकी कैंपों को ध्वस्त करे और आतंकवाद से लड़ने का साहस दिखाए।