यात्रीगण ध्यान दें, टाइम मशीन 14वीं सदी में है। प्लेग यानी ब्लैक डेथ का आतंक है। प्लेग यूरोप को निगल रही है। लोग शहर छोड़कर भाग रहे हैं। लूटपाट और अराजकता का आलम है। सम्राट एडवर्ड तृतीय परेशान हैं-कैसे पता चले कि कौन मरा, कौन बचा? उन्होंने चर्च ऑफ इंग्लैंड को आदेश दिया कि हर मौत का हिसाब रखा जाए। स्थानीय प्रशासन को निर्देश मिला कि मरने वालों का ब्योरा-नाम, लक्षण और कारण-लंदन भेजा जाए। यह लंदन बिल्स ऑफ मार्टिलिटी है। यह प्लेग का साप्ताहिक बुलेटिन है-21वीं सदी के कोविड डैशबोर्ड जैसा। लंदन बिल्स ऑफ मॉर्टेलिटी दुनिया का पहला व्यवस्थित स्वास्थ्य आंकड़ा संग्रह है। बिल पहले किंग व उनके सलाहकारों को दिखाए जाते हैं, फिर जनता में बांटे जाते हैं। इसका मकसद बड़ा विचित्र है। प्लेग के डर से अमीरों ने शहर छोड़ दिया है। बिल्स के जरिये किंग इन रईसों को बता रहे हैं कि महामारी ज्यादातर गरीबों को मार रही है, लिहाजा वे लौट सकते हैं। उनके आने से टैक्स मिलेगा व कारोबार चलेंगे। इतिहासकार स्टीफन ग्रीनबर्ग लिखेंगे कि 17वीं सदी तक इन बिल्स की पांच से छह हजार प्रतियां हर साल छपती व बंटती थीं।
लंदन बिल्स ऑफ मॉर्टेलिटी में यह भी लिखा जाता है कि कितने लोग ‘दांत निकलने‘ या ‘उदासी’ से मरे। मॉर्टेलिटी बिल्स को जुटाने का काम स्थानीय ‘सर्चर्स’ को देते हैं। ये महिलाएं, जो मृतकों की जांच करती हैं, कम पढ़ी-लिखी होती हैं, जिसके कारण बिल्स में गलतियां होती हैं, फिर भी, बिल्स ऑफ मॉर्टेलिटी एकमात्र आधिकारिक सूचना स्रोत है, जो अफवाहों के बीच सच का झंडा बुलंद करता है। टाइम मशीन अब 17वीं सदी में है। हम लंदन में हैं। लंदन फिर प्लेग और चेचक की चपेट में है। मगर चर्चा में हैं जॉन ग्राउंट। ग्राउंट कोई मशहूर डॉक्टर हैं? न जी न, ग्राउंट तो एक समृद्ध व्यापारी हैं, जो दर्जियों का सामान बेचते हैं। 1666 की लंदन की आग में उनकी दुकान जलकर खाक हो गई थी, अलबत्ता आंकड़ों को पढ़ने और पैटर्न बनाने में उन्हें महारत हासिल है।
हम अब ग्राउंट के दफ्तर में हैं, जहां वह लंदन बिल्स ऑफ मॉर्टेलिटी पढ़ रहे हैं। उनकी किताब आई, नेचुरल एंड पॉलिटिकल ऑब्जर्वेशंस मेड अपॉन द बिल्स ऑफ मॉर्टेलिटी (1662)। ग्राउंट की किताब चार हिस्सों में छपी है, जिसमें उन्होंने लंदन की जनसंख्या, मृत्यु दर और बीमारियों के रुझान का विश्लेषण किया है। उन्होंने मृत्यु के कारणों को 80 से ज्यादा श्रेणियों में बांटा, जैसे ‘प्लेग’, ‘बुखार’,और यहां तक कि ‘भय से मृत्यु।’ किताब ने लंदन के बौद्धिकों में सनसनी मचा दी है, क्योंकि ग्राउंट ने न सिर्फ मौतों का विश्लेषण किया, बल्कि लंदन की जनसंख्या का पहला अनुमान भी लगाया है। इस वक्त जब टाइम मशीन लंदन में है, तो इस शहर की आबादी लगभग 3.84 लाख है। ग्राउंट ने यह भी बताया कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों में मृत्यु दर ज्यादा रही, जो शहरीकरण के स्वास्थ्य जोखिम की पहली वैज्ञानिक पड़ताल है। ग्राउंट ने अपने आंकड़ों से यह भी सुझाया कि लंदन में जन्मदर मृत्युदर से कम थी, यानी आबादी बढ़ाने के लिए बाहरी लोगों का बसना जरूरी है।
टाइम मशीन अब 17वीं सदी के उत्तरार्ध में है। ग्राउंट का शोध दो दिग्गजों को प्रेरित कर रहा है। एक हैं सर विलियम पेटी और दूसरे एडमंड हेली। ग्राउंट की किताब की रोशनी में इन दोनों के शोध पर लंदन में बड़ी चर्चा है। पेटी, ग्राउंट के गहरे दोस्त हैं। ग्राउंट से ही पेटी को पता चला कि जनसंख्या और आर्थिक नीतियों का गणितीय अध्ययन किया जा सकता है। पेटी ग्राउंट के मॉडल को अपनाकर पॉलिटिकल अर्थमेटिक की नींव रखेंगे, जिसमें वह पहली बार आंकड़ों के आधार पर जनसंख्या, व्यापार, और टैक्स का विश्लेषण करेंगे। आने वाली सदियां विलियम पेटी को राजनीतिक अर्थशास्त्र के पितामह के तौर पर जानेंगी। अब जरा एडमंड हेली की बैठक में चलते हैं, जिन्हें भविष्य हेली कॉमेट खोजने के लिए याद करेगा। वह इस वक्त ग्राउंट से प्रभावित हैं। कुछ ऐसा करने वाले हैं, जो उनकी अंतरिक्ष शोध वाली तैयारियों से बिल्कुल अलग है।
हेली ने ग्राउंट की किताब आते ही जनसांख्यिकीय तकनीकों को अपनाकर जीवन प्रत्याशा और बीमा तालिकाओं का अध्ययन शुरू कर दिया था। हेली ने 1693 में जर्मनी के ब्रेस्लाउ शहर के मृत्यु आंकड़ों का विश्लेषण कर लाइफ टेबल्स बनाईं, जो बीमा उद्योग की नींव बनीं। यानी किसी को बीमा देते हुए लाइफ एक्सपेक्टेंसी का क्या पैमाना तय किया जाए। खैर, हम वापस ग्राउंट पर आते हैं। यूरोप में अब उनकी बड़ी चर्चा है। ग्राउंट को 1662 में रॉयल सोसाइटी का सदस्य बनाया गया, जो उस समय का सबसे बड़ा वैज्ञानिक सम्मान था। हम महामारी की चर्चा पर लौटते हैं। ग्राउंट की किताब ने दुनिया को पहली बार आंकड़ों के जरिये महामारी का विज्ञान समझाया है। ग्राउंट ने पाया कि मौतों की संख्या और आबादी की सघनता में गहरा संबंध है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि महामारी का अंत तब माना जाए, जब मृत्यु दर सामान्य दिनों के बराबर हो जाए। इसे एक्सेस डेथ थ्योरी कहा जाएगा।
टाइम मशीन अब भारत पहुंच रही है। उतरते ही किसी विशेषज्ञ से पूछिएगा कि महामारी के समापन की घोषणा ग्राउंट की इसी एक्सेस डेथ थ्योरी पर होती है। भारत के सिविल रजिस्ट्रेशन ने 2021 में मौतों के जो आंकड़े दिए हैं, वे जनसांख्यिकीय आंकड़ों की ग्राउंट परंपरा से आते हैं। इन आंकड़ों ने भारत में कोविड से मौतों के सरकारी आंकड़ों को आईना दिखाया है। वैक्सीन विशेषज्ञ कहते हैं कि महामारी का अंत तब माना जाए, जब इसका जनस्वास्थ्य पर असर कम हो जाए। अगर कोविड सामान्य फ्लू जैसा बन जाए, तो इसे खत्म मान लिया जाएगा, लेकिन वायरस का खात्मा नहीं होगा। ऐसा ही कुछ हो रहा है... ग्राउंट को याद रखिएगा। उन्होंने कहा था कि आंकड़े सच बोलते हैं, बशर्ते हम उन्हें सुनना चाहें। फिर मिलते हैं अगले सफर पर...