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Greenland: ग्रीनलैंड में ऐसा क्या है? जानिए क्या है अमेरिका का टॉप सीक्रेट प्रोजेक्ट आइसवार्म

अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 01 Feb 2026 05:48 AM IST

सार

अमेरिका 159 साल से ग्रीनलैंड को खरीदने की जिद पर अड़ा है-पांच बार कोशिश की, पर हर बार नाकाम। अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ग्रीनलैंड व आइसलैंड चाहते हैं। उनके हाथ में पियर्स रिपोर्ट  है, जिसमें कहा गया है कि ग्रीनलैंड और आइसलैंड मिलाने से कनाडा घिर जाएगा तथा ब्रिटेन को अमेरिका में मिलने के लिए मजबूर किया जा सकता है। संभवतः यही वजह है कि ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बता रहे हैं।
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ग्रीनलैंड - फोटो : अमर उजाला


डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में दो टूक कहा कि उन्हें ग्रीनलैंड चाहिए। यूरोप को फुसलाया। ग्रीनलैंड वाले टैरिफ टाल दिए। धमकाया भी कि सेना भेज सकते हैं। इधर ट्रंप दावोस में गरज रहे थे, उधर दूर ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में देश के प्रमुख म्यूटे एगेड यूरोपीय सैनिकों की अगवानी कर रहे थे। डेनमार्क, फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और फिनलैंड के झंडे हवा में फड़फड़ा रहे थे। अपना मोबाइल चेक कीजिए। उस पर मैसेज है, जो बता रहा है कि अमेरिका 159 साल से ग्रीनलैंड को खरीदने की जिद पर अड़ा है-पांच बार कोशिश की, पर हर बार नाकाम। इस रोमांचक किस्से को जानने के लिए, आइए टाइम मशीन में। सफर बड़ा लंबा है। हमें दो बड़े अनोखे कालखंडों का गवाह बनना है, जो 2025 में ग्रीनलैंड के आसपास जमी सियासत की वजह हैं। क्या पता इस सफर में इस सवाल का भी जवाब मिल जाए कि ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य क्यों बता रहे हैं।


हमें 1940 तक पहुंचना है, मगर उससे पहले एक छोटा पड़ाव डालते हैं वाशिंगटन में। वर्ष 1867। अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड का ऑफिस नक्शों से भरा है। मोमबत्ती की पीली रोशनी में उनका चेहरा चमक रहा है। उन्होंने रूस से अलास्का 72 लाख डॉलर में खरीदा है, लोग इसे ‘सीवार्ड का पागलपन’ कह रहे हैं, लेकिन सीवार्ड तो ग्रीनलैंड और आइसलैंड चाहते हैं। उनके हाथ में उन्ही की बनवाई पियर्स रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है कि ग्रीनलैंड व आइसलैंड मिलाने से कनाडा घिर जाएगा और ब्रिटेन को अमेरिका में मिलने के लिए मजबूर किया जा सकता है। गृहयुद्ध से थकी अमेरिकी राजनीति ने सीवार्ड की योजना नहीं मानी। मगर इविट्टूट का इलाका अमेरिका की नजर में आ गया। यहीं से ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय होड़ की शुरुआत हो रही है।


हम 1940 की तरफ बढ़ रहे हैं। आप अपनी सीट के सामने लगी स्क्रीन देखिए। यह जो सफेद दूधिया तत्व आपकी स्क्रीन पर दिख रहा है, उसे 1799 में, डेनिश रसायनशास्त्री पेडर क्रिश्चियन एबिलगार्ड ने इविट्टूट की बस्ती के पास खोज निकाला था। यह है-सोडियम एल्युमिनियम फ्लोराइड। उन्होंने इसे क्रायोलाइट नाम दिया-बर्फ का पत्थर। वर्ष 1884 में, अलग-अलग काम करते हुए दो रसायनशास्त्रियों-अमेरिकी चार्ल्स मार्टिन हॉल और फ्रांसीसी पॉल हेरोल्ट ने एल्युमिनियम निकालने की हॉल-हेरोल्ट प्रक्रिया ईजाद की। यहीं से क्रायोलाइट की किस्मत हमेशा के लिए बदल गई। एल्युमिना को पिघलाने के लिए 2050 डिग्री तापमान चाहिए, पर क्रायोलाइट मिलाने पर इसे पिघलाने के लिए मात्र 900-1000 डिग्री तापमान ही चाहिए होता है। इससे एल्युमिनियम सस्ता हो गया है। टाइम मशीन अब 1916 से गुजर रही है। पहली बड़ी जंग का दौर है। अमेरिका को डर है कि जर्मनी डेनिश वेस्टइंडीज (आज का यूएस वर्जिन आइलैंड्स) पर कब्जा कर पनामा नहर के पास जर्मन नौसैनिक अड्डा बना लेगा।


वाशिंगटन ने डेनमार्क से वर्जिन आइलैंड खरीद लिया है और बदले में ग्रीनलैंड हुआ डेनमार्क का। अगले पांच साल में डेनमार्क ग्रीनलैंड पर पूरा नियंत्रण कर लेगा तथा ग्रीनलैंड कब्जाने की नार्वे की कोशिशों को भी खत्म कर देगा। इसी समय जंगी विमानों को बनाने के लिए एल्युमिनियम और क्रायोलाइट की जरूरत है, मगर जर्मनी के डर से अमेरिका इस कीमती खनिज पर कब्जे से चूक गया है। और लीजिए, अब हम 1940 में आ गए हैं। टाइम मशीन ग्रीनलैंड के इविट्टूट में उतर रही है। दूसरे विश्वयुद्ध का दौर है। नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया है। क्रायोलाइट के बिना मित्र देश जंग कैसे लड़ेंगे? क्रायोलाइट मिले, तो एल्युमिनियम बने, फिर बनें विमान। अब हम वाशिंगटन में हैं। अमेरिकी सेक्रेटरी कॉर्डेल हल और डेनिश राजदूत हेनरिक कॉफमैन एक समझौते पर सहमत हुए हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड की सुरक्षा करेगा। इविट्टूट में 500 अमेरिकी सैनिक उतरे हैं। वर्ष 1942। सस्ते एल्युमिनियम से अमेरिका ने 47,000 हवाई जहाज बना डाले। यह न होता, तो हिटलर को हराना संभव नहीं था। जंग खत्म होते ही ट्रूमन प्रशासन ने ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की। यूरोप के अखबारों में सुर्खियां हैं कि डेनमार्क ने ऐसा करने से मना कर दिया है।


यह 1960 का दशक है। ग्रीनलैंड के इतिहास का सबसे सनसनीखेज दौर। अमेरिका ग्रीनलैंड की ‘सुरक्षा’ कर रहा है। पर अब आप उस घटना के गवाह बनेंगे, जब पहली बार अमेरिका पर नाटो का भरोसा टूटा था। इसके बाद ग्रीनलैंड पर अमेरिका की कोशिशें हमेशा के लिए संदेह के घेरे में आ गईं। आप 21वीं सदी से आ रहे हैं, तो आपको पता है कि क्या हुआ था, मगर यहां किसी को कुछ पता नहीं। वह सामने देखिए, अमेरिकी सेना के इंजीनियर बर्फ को ड्रिल से खोद कर आर्कटिक में निर्माण का परीक्षण कर रहे हैं। बीच में एक छोटा पोर्टेबल परमाणु रिएक्टर चमक रहा है। अमेरिका इसकी बिजली से यहां शहर बना रहा है। नाटो वाली दोस्ती का तकाजा है कि डेनमार्क की सरकार ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। उनके अधिकारियों को सब ठीक दिखता है। अब जरा करीब आइए। यह अमेरिका का टॉप-सीक्रेट प्रोजेक्ट आइसवार्म है। बर्फ के नीचे 4,000 किलोमीटर लंबी सुरंगें खोदी जा रही हैं, जो 2,500 मील तक फैली हैं। सोवियत सैटेलाइट से छिपाकर यहां परमाणु हथियार वाली मध्यम दूरी की 600 बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात करने की योजना है, ताकि सोवियत रूस पर तत्काल हमला किया जा सके। अमेरिका यहां बर्फ और प्लूटोनियम से डूम्सडे मशीन बना रहा है और डेनिश सरकार को कुछ पता नहीं।


यह 1967 का साल है। सुरंगें ध्वस्त हो जाएंगी। प्रोजेक्ट आइसवार्म बंद। रिएक्टर का कोर निकाल लिया गया, पर बाकी सब छोड़ दिया गया है। यहां 30 मीटर नीचे दबा है दो लाख लीटर डीजल ईंधन, गंदा पानी और रेडियोएक्टिव कचरा। अमेरिका ने सोचा है कि बढ़ती बर्फ में यह हमेशा छिपा रहेगा। टाइम मशीन अब 1995 में है। करीब 37 साल बाद डेनमार्क को पता चला है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में क्या बना रहा था। अमेरिका ने नाटो देश की जमीन पर बिना इजाजत 600 परमाणु मिसाइलें लगाने की योजना लागू कर दी, जो डेनमार्क की परमाणु-मुक्त नीति का उल्लंघन है। डेनमार्क और अमेरिका के रिश्ते अब हमेशा के लिए खराब हो गए हैं। टाइम मशीन वापसी के सफर पर है। आपकी स्क्रीन पर नासा की रिपोर्ट आ रही है। अगर जलवायु परिवर्तन जारी रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक कैंप का परमाणु कचरा ऊपर आ जाएगा। यह आर्कटिक महासागर पहुंच कर बड़ी तबाही मचा देगा। मगर क्या उससे पहले ट्रंप ग्रीनलैंड को जीत लेंगे? हम नुउक में उतर रहे हैं। सबको ग्रीनलैंड चाहिए, मगर ग्रीनलैंडर्स को क्या चाहिए, कोई पूछेगा क्या? आपसे भी यही सवाल किया जाएगा। जवाब तैयार रखिएगा।
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फिर मिलते हैं अगले सफर पर...
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