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ईरान से दोस्ती पर आपत्ति कैसी

Fri, 04 Oct 2013 07:36 PM IST
रोजर कोहन
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इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हमेशा दुनिया को बताते आए हैं कि ईरान एक दुष्ट राष्ट्र है। 2006 में अपने एक भाषण में उन्होंने ईरान की तुलना 1938 के जर्मनी से की थी। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के मंच से उन्होंने एक बार फिर वही बात दोहराई। अपने इस भाषण में उन्होंने ईरान की तुलना 20वीं सदी के नाजियों के निरंकुश शासन वाले जर्मनी से की। उनके इस रुख पर सवाल खड़े करने वालों में अमेरिकी यहूदी समिति के कार्यकारी निदेशक डेविड हैरिस भी शामिल हैं। इस्राइल के एक दैनिक समाचार पत्र में उन्होंने लिखा कि ईरान के नए राष्ट्रपति हसन रोहानी से संपर्क रखने वाले हर शख्स की तुलना हिटलर के साथ विवादित म्यूनिख समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले ब्रिटेन और फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्रियों क्रमशः नेविल चैंबरलिन और एडुअर्ड डाल्डियर से करना न केवल गलत है, बल्कि कड़वाहट पैदा करने वाला भी है।
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नेतन्याहू के कट्टर समर्थक माने जाने वाले अमेरिकी यहूदी समिति के नेताओं ने जिस तरह से ईरान से जुड़ी उनकी सोच पर उंगली उठाई है, यह देखते हुए इस्राइली प्रधानमंत्री से यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वह रोहानी को रंगा सियार मानने के अपने पूर्वाग्रह का त्याग करें। यह सच है कि नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसके खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि सीरिया, इराक और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसियों की तुलना में ईरान में ज्यादा स्थिरता का माहौल है। बतौर राष्ट्रपति रोहानी का चुनाव भी यही बताता है कि ईरान की तुलना निरंकुश सत्तावादी नाजी राज्य से नहीं की जा सकती।

दरअसल, दांव पर तो नेतन्याहू की विश्वसनीयता है। एक लोकतांत्रिक यहूदी देश होने के नाते इस्राइल के सामने सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि वह अब तक फलस्तीन के साथ शांतिपूर्ण संबंध नहीं बना सका है और दूसरी ओर पश्चिमी तट क्षेत्र पर आधिपत्य के मुद्दे का भी कोई अंत नहीं दिख रहा। एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक केवल 17 प्रतिशत अमेरिकी यहूदी ही मानते हैं कि पश्चिमी तट पर इस्राइली बस्तियों का निर्माण उसकी सुरक्षा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
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चुनौतियां हालांकि ईरान के सामने भी हैं। यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि रोहानी के ईरान से विश्व को कोई खतरा नहीं हो सकता। ईरान का परमाणु संवर्द्धन कार्यक्रम अब भी पूरे विश्व के लिए खतरा साबित हो सकता है। ईरान ने अमेरिकी और इस्राइलियों की हत्या की है और अमेरिकी हितों पर आघात किया है। इसके बावजूद ईरान के साथ किसी भी सौदे को लेकर ओबामा पारदर्शिता की बात करते हैं, तो यह सही है। ईरान के साथ परमाणु समझौते पर समयबद्ध वार्ता का माहौल यदि तैयार हो रहा है, तो इस्राइल को उसमें बाधा नहीं डालनी चाहिए। इससे उसे कोई फायदा नहीं होगा। सीमित क्षमता वाले और पूरी तरह नजर में रखे जाने वाले जिस ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर ओबामा सहमत हैं, उस पर इस्राइल की असहमति का कोई औचित्य नहीं है। ईरान के साथ होने वाले किसी भी समझौते से ईरान-अमेरिका संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। इस्राइल को लगता है कि ईरान के साथ अमेरिकी नजदीकी उसके लिए फायदेमंद नहीं है। इसी कारण नेतन्याहू बौखलाए हुए हैं, जबकि अभी उनका ध्यान फलस्तीन के साथ वार्ता पर होना चाहिए।

गौरतलब है कि ओबामा प्रशासन ने हाल ही में उपराष्ट्रपति जो बिडेन को इस्राइल समर्थक माने जाने वाले जे स्ट्रीट संगठन के वार्षिक सम्मेलन में भेजा। जे स्ट्रीट अरब-इस्राइल और इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के खात्मे के लिए अमेरिकी नेतृत्व की वकालत करता है। इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिका इस्राइल-फलस्तीन विवाद के खात्मे को लेकर कितना गंभीर है। आने वाले महीनों में इस मामले में वार्ताओं की गति बढ़ने की पूरी उम्मीद है। यह जानना भी रोचक है कि इस मुद्दे पर पहली बार व्यवस्थित ढंग से अमेरिकी यहूदी समुदाय को भी शामिल किया गया है, ताकि नेतन्याहू पर दबाव बनाया जा सके। पुराने बयानों को दोहराने के बजाय नेतन्याहू को बदलते हालात के लिए तैयार रहना चाहिए।
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