फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

भारत के पास क्या विकल्प है

मारूफ रजा
Updated Wed, 05 Oct 2016 07:06 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
मारूफ रजा
उड़ी हमला पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति के लिए एक निर्णायक मोड़ था, जिससे देश भर के लोगों का धैर्य चुक गया। लेकिन क्या उड़ी हमले के बाद हुआ सर्जिकल हमला पाकिस्तान और उसकी सेना के कट्टरपंथियों का मुकाबला करने के लिए एक नई रवायत बनेगा, जो नहीं चाहते कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते सुधरें, क्योंकि तब वे अपने संस्थागत हित को साधने के लिए भारत के प्रति शत्रुता की भावना का इस्तेमाल करने में अक्षम हो जाएंगे। भारत में इस बात को लेकर सार्वजनिक बहस शुरू हो गई है कि आतंकी हमलों से मुकाबला करने के लिए हमारे पास अब विकल्प क्या है-सर्जिकल हमला या छोटा-सा तेज युद्ध या कूटनीतिक दबाव या आर्थिक दंड।


सबसे पहले तो भारतीय राजनेताओं और लोगों को समझना होगा कि पाकिस्तान खास तौर पर 1990 से भारत के साथ युद्ध की स्थिति में है और यह झड़प के रूप में है, जिसे हमारे सशस्त्र बलों को महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में स्वीकार करना चाहिए और समय-समय पर इनका सैन्य प्रतिकार करने लिए उन्हें मुकाबला करना होगा, जैसा कि अभी हमने देखा। हालांकि राजनीतिक नेतृत्व को अनिर्णय की स्थिति के लिए दोषी ठहराया जाता है, लेकिन पाकिस्तान को सबक सिखाने में नाकाम रहने से सैन्य नेतृत्व को भी दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।


अतीत में जब राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी शिविरों पर दंडात्मक हमले करने के लिए कहा गया, तो वायु सेना ऐसा करने में अक्षम थी, क्योंकि वह आतंकी ठिकानों की विशिष्ट जानकारी के लिए खुफिया एजेंसियों पर निर्भर थी। इसे 2001, 2008 और हाल ही में हुए पठानकोट हमले के बाद हमारे सैन्य बलों की सीमा के रूप में देखा गया। इस कमी को पूरा करने के लिए बहुत कुछ नहीं किया गया है। सेना के हरेक अंग में पारंपरिक हथियारों की कमी है, जिसे न पहले पूरा किया गया और न अब। अगर आगे तल्खी और बढ़ती है, तो क्या होगा?


कूटनीतिक रूप से भारत ने पाकिस्तान के आतंकी एजेंडे को कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी वैश्विक समर्थन हासिल कर लिया है और हर बीतते हफ्ते के साथ इसमें इजाफा हो रहा है। शुरू में भारत ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और अन्य पड़ोसियों के साथ बेहतर रिश्ते कायम करके पाकिस्तान पर दबाव बनाया, जिससे इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क सम्मेलन रद्द हो गया। अफगानिस्तान में पाकिस्तान विरोधी बढ़ती भावनाओं के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया गया। डूरंड रेखा की शुचिता पर बहस शुरू करवाई गई, जिसे अफगानी सीमा नहीं मानते। बलूचिस्तान और सिंध की आजादी के लिए भारतीय मान्यता को संभव बनाया गया और पीओके और गिलगिट-बाल्टिस्तान में पाक विरोधी तत्वों का खुलेआम समर्थन किया गया, जिसे अनिवार्य रूप से भारत में होना चाहिए, क्योंकि हमारे संविधान के अनुसार वह भारत का अंग है, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा किया हुआ है।


सिंधु जल संधि को खत्म करने या उसकी समीक्षा करने से भी भारत को कोई रोक नहीं सकता। इसके अलावा भारत उसके खिलाफ आर्थिक शिकंजा भी कस सकता है। भारत यूरोपीय संघ से पाकिस्तानी वस्तुओं को प्रतिबंधित करने के लिए आग्रह कर सकता है, जो पाकिस्तानी टेक्सटाइल निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है। और अरब जगत पर भी, जो पाकिस्तान को वैध और अवैध तरीके से भारी वित्तीय सहायता देता है, भारत को दबाव बनाना चाहिए कि वह पाकिस्तान को वित्तीय व अन्य सहायता में कटौती करने पर गंभीरता से विचार करे, अन्यथा भारत ईरान से कच्चा तेल मंगा सकता है। सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत की मांग पर अमेरिका क्या कदम उठाता है, क्योंकि अमेरिका के नेता और उसकी सेना के पाकिस्तान के साथ पारंपरिक रिश्ते रहे हैं और वह जल्दी पाकिस्तान को नहीं छोड़ने वाला, भले ही अमेरिकी सांसदों द्वारा पाकिस्तान को आतंक प्रायोजित करने वाले मुल्क घोषित करने संबंधी विधेयक अमेरिकी संसद में बहस के लिए पेश किया गया हो। भारत की त्रासदी यह है कि हमारी अपनी व्यवस्था में अमेरिका के प्रति सहानुभूति रखने वाले काफी लोग हैं, क्योंकि उनके परिवार के सदस्यों के वहां होने से उनके अपने निजी हित उससे जुड़े हैं।


ऐसी कोई संभावना नहीं है कि पाकिस्तान के सैन्य कमांडर भारत के प्रति अपनी नीति के औजार के रूप में आतंकवाद का जल्द ही परित्याग कर देंगे, जब तक कि पाकिस्तानी लोगों के बजाय सीधे पाकिस्तानी सेना पर प्रतिबंध न लगाया जाए। प्रतिबंधों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि जब भी किसी देश पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो वहां के नेतृत्व पर व्यापार और वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध का सबसे अंत में असर पड़ता है, क्योंकि जरूरतों की पूर्ति चीन जैसे देशों द्वारा मुहैया कराए गए कालाबाजार से होती है और पाकिस्तान के मामले में भी ऐसा ही है। जब पाकिस्तानी जनरलों और उनके परिजनों पर पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका की यात्रा करने या स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा हासिल करने पर प्रतिबंध लगेगा, तो उसका उन पर काफी प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही अगर सिंधु जल का प्रवाह पाकिस्तान में कम हो जाएगा, तो वहां की सेना पर लोगों का दबाव बढ़ेगा, क्योंकि पाकिस्तान की दो निर्यात वाली फसलें कपास और चावल पानी पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार यदि पारंपरिक संघर्ष होता है, तो वह एक छोटा-सा तेज संघर्ष होगा, जिसमें परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं होगा, क्योंकि विशेषज्ञों के मुताबिक, अपने तमाम परमाणु दावों के बावजूद पाकिस्तानी सेना परमाणु हथियारों का प्रयोग करने के प्रति अनिच्छुक हैं।


भले ही हम पाकिस्तान से निपटने में सक्षम हैं, लेकिन एक सामूहिक अंतर-सेवा सुरक्षा सिद्धांत की हमें बेहद जरूरत है, जिसमें स्पष्ट रूप से राष्ट्र के महत्वपूर्ण हित, उद्देश्य और लक्ष्य परिभाषित होंगे।  इसमें आंतकी हमलों की स्थिति में सामूहिक प्रतिक्रिया करने की क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next