केंद्रीय साहित्य अकादमी ने पिछले कुछ वर्षों से देश की लोकभाषाओं के रचनाकारों को पुरस्कृत करने की योजना बनाई है। एक लाख रुपये के ये पुरस्कार कई लोकभाषाओं को दिए जा चुके हैं। इस साल कुमाउंनी की बारी थी। हर वर्ष की तरह तीन सदस्यों की ज्यूरी गठित की गई, जिसमें एक सदस्य मैं भी था। मेरे अतिरिक्त एक सदस्य हिंदी के वरिष्ठ रचनाकार थे, जिन्हें हिंदी साहित्य के लिए अकादमी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका था। एक अन्य सदस्य देश की राजधानी की हिंदी अकादमी के सचिव थे। हम तीन सदस्यों के अतिरिक्त बैठक में साहित्य अकादमी के सचिव और तीन अन्य सदस्य भी उपस्थित थे।
कुमाउंनी हिंदी की एक उपभाषा मध्य-पहाड़ी की एक बोली है, जिसमें लोक साहित्य के अतिरिक्त पर्याप्त मात्रा में लिखित साहित्य भी मौजूद है। इसके पहले रचनाकार ‘गुमानी’ (1790-1846) एक साथ अनेक भाषाओं में रचनाएं करते थे। संस्कृत के तो वह पंडित थे ही, हिंदी, नेपाली और कुमाउंनी में भी लिखते थे। उन्हें खड़ी बोली हिंदी का भी पहला लेखक माना जाता है।
लिखित साहित्य की परंपरा के बावजूद कुमाउंनी का चरित्र एक लोकभाषा का है और उसका रचनात्मक विकास भी इसी रूप में हुआ है। मेरा मानना है कि दूसरी अनेक लोकभाषाओं की तरह कुमाउंनी भी एक गेय भाषा के रूप में विकसित हुई। लोकभाषाओं का मूल्यांकन समृद्ध एवं औपचारिक भाषाओं के साहित्य के रूप में संभव भी नहीं है। अपनी इसी मान्यता के आधार पर साहित्य अकादमी के इस भाषा सम्मान के लिए मैंने कुमाउंनी के सबसे लोकप्रिय और बहुश्रुत गीतकार हीरा सिंह राणा को चुना और उनसे जुड़ा एक विस्तृत आलेख तैयार किया।
बैठक की शुरुआत मेरे आलेख से ही हुई, हालांकि इससे पहले जब निर्णायकों की राय ली गई, तब दो निर्णायकों ने हीरा सिंह राणा के पक्ष में अपनी राय दी, जबकि अकादमी सम्मान प्राप्त वरिष्ठ लेखक ने इस पर गहरी आपत्ति दर्ज की। मैंने उत्साह के साथ अपना आलेख पढ़ना शुरू किया, पर कुछ ही पल बीते थे कि अकादमी के अधिकारी बारी-बारी से बैठक से उठकर दूसरे कमरे में आने-जाने लगे। मुझे इस बात का एहसास तो हो गया था कि अकादमी के अधिकारियों समेत वरिष्ठ कवि मुझसे सहमत नहीं हैं। अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने एक-दो सस्ते लोकप्रिय कवियों का जिक्र करते हुए कहा कि पाठकों-श्रोताओं में लोकप्रिय होने के कई और कारण भी हो सकते हैं, लेकिन ये कारण उसे सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक सम्मान दिए जाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।
मैंने तर्क रखा कि साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध भाषा और लोकभाषा के मूल्यांकन की प्रक्रिया एक नहीं हो सकती, क्योंकि दोनों का पाठक एक नहीं होता। नए समाज में लोकभाषाएं बोलने वाले लोग धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। बड़ी, समृद्ध तथा उपयोगी भाषाओं का दबाव इस कदर बढ़ रहा है कि लोकभाषाएं मर रही हैं। ऐसे में लोकभाषाओं को जीवित रखने का काम लोकगीत और इन भाषाओं से जुड़ी अभिव्यक्तियां ही कर रही हैं, जिनमें गीतकार मुख्य हैं। लोकभाषाओं और साहित्यिक भाषाओं की अभिव्यक्ति के अंतर को हम उनसे जुड़े समाज के अंतर को समझे बिना रेखांकित नहीं कर सकते।
लेकिन बहस फिर उसी तर्क पर आ खड़ी हुई कि फिल्मी गीतों को हम कविता का दर्जा कैसे दे सकते हैं। हम हिंदीभाषी मध्यवर्गीय लोगों के साहित्यिक संस्कार कमोबेश इस आधार पर निर्मित हुए हैं कि लोकप्रिय अभिव्यक्ति द्वारा गंभीर और विचारशील विश्लेषण संभव नहीं है, इसलिए गीतों को कविता की कक्षा में बराबर की जगह कैसे दी जा सकती है! लेकिन अंग्रेजी जैसी अंतरराष्ट्रीय भाषा के दबाव में जब राष्ट्रभाषा हिंदी ही दम तोड़ती दिखाई दे रही हो, तब कुमाउंनी की भला क्या बिसात!
निर्णायक समिति की बैठक में वरिष्ठ रचनाकार की उम्र और उनके साहित्यिक योगदान तथा अकादमी के अधिकारियों का आतंक ऐसा छाया कि हमारे दूसरे निर्णायक का रुख भी एकाएक बदल गया और उन्होंने दो-तीन नए नाम विचारार्थ प्रस्तुत कर दिए। जाहिर है कि मैं अकेला पड़ गया था। अब तक अल्पमत में रहे वरिष्ठ लेखक ने तत्काल अपनी ओर से भी दो-चार नाम जोड़ दिए और उन पर भी विचार करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रक्रिया में और चाहे जो भी हुआ हो, हीरा सिंह राणा का नाम हाशिये पर चला गया। यह बात भी महत्वहीन हो गई कि लोकभाषाओं को समाज में कैसे जीवित रखा जा सकता है। कमोबेश यह बात तो उभरकर सामने आ ही चुकी थी कि साहित्यिकता और लोकप्रियता एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएं हैं।
मेरा इरादा किसी का विरोध करना तो नहीं था, पर अनायास मेरे मुंह से निकला कि अगर बहस को ऐसा ही बनाए रखना है, तो यह सम्मान ऐसे व्यक्ति को देना चाहिए, जिन्होंने अपना सारा जीवन कुमाउंनी भाषा-साहित्य के शोध और सर्जना में लगाया है और जो जल्दी ही अपने जीवन की शताब्दी मनाने जा रहे हैं। कुमाउंनी की इस अप्रतिम प्रतिभा चारुचंद्र पांडे के नाम पर सब लोग सहमत हो गए, हालांकि यह तर्क भी रखा गया कि पुरस्कार की राशि चारुचंद्र पांडे और हीरा सिंह राणा में बांट दी जाए। मगर साहित्य के शुद्धतावादी ‘कविता’ के समकक्ष अछूत विधा ‘गीत’ को भला कैसे रख सकते थे? अंत में वही हुआ, जो होना था।