यह ध्यान देने वाली बात है कि शीर्ष अदालत ने इसे एक सुनियोजित प्रयास करार दिया है, जिसका अर्थ ही है कि यह कोई आकस्मिक या भावनात्मक उबाल नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने की एक गंभीर कोशिश थी। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के लिए सात अप्रैल की समय-सीमा तय की है और 31 मार्च तक कुल साठ लाख में से 47 लाख से भी ज्यादा आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है।
प्रक्रिया से जुड़े आंकड़ों पर खुद सर्वोच्च न्यायालय ने संतुष्टि जताई है, जो इस पर भरोसा जताने के लिए काफी होना चाहिए। फिर भी अगर किसी को एसआईआर प्रक्रिया को लेकर कोई आपत्ति हो, तो उसे जाहिर करने के रास्ते हैं, पर अधिकारियों को डराना-धमकाना या उन्हें शारीरिक रूप से रोकना न केवल प्रशासनिक कामकाज में विघ्न डालता है, बल्कि मताधिकार की पवित्रता को भी चोट पहुंचाता है।
इस मामले में राज्य सरकार की भूमिका तो और भी शर्मनाक रही। घेराव शुरू होते ही सर्वोच्च न्यायालय तक सूचना पहुंच गई, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह कहना कितना तर्कसंगत है कि उन्हें किसी ने सूचना नहीं दी। अदालत ने इसका गंभीर संज्ञान लेते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी समेत आला अधिकारियों को उचित ही कारण बताओ नोटिस जारी किया है, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि राज्य में यह ऐसी कोई अकेली घटना नहीं है।
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान, पहले भी निर्वाचन अधिकारियों का पीछा करने, उन्हें घेरने या मारपीट करने की घटनाएं सामने आती रही हैं, पर मालदा की घटना ने तो हद ही पार कर दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का पश्चिम बंगाल को राजनीतिक तौर पर सर्वाधिक ध्रुवीकृत राज्य बताना और चुनाव आयोग की बंगाल में जंगल राज होने की टिप्पणी गंभीर है। ऐसे में, यह जरूरी है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।