सिंघल साहब को गुस्सा गलत नहीं आता है। बेचारों की यात्रा शुरू होने से पहले ही फेल हो गई। चौरासी कोस की छोड़ो, कोस-दो कोस भी नहीं चल पाए। पर मजाल है, जो किसी ने दिखाने को भी हमदर्दी दिखाई हो। बड़े-बड़े संतों-महंतों को हिरासत वगैरह का मुंह देखना पड़ गया। संसद में भी अपनों को छोड़कर जली-कटी ही सुनने को मिली। इसके बाद भी भाई लोगों को इसमें फिक्सिंग नजर आ रही है।
वैसे भी जो लोग फिक्सिंग-फिक्सिंग का शोर मचा रहे हैं, उन्हें पता भी है कि फिक्सिंग क्या होती है? जैसे ताली एक हाथ से नहीं बजती है, वैसे ही फिक्सिंग में कम से कम दो पार्टियों का शामिल होना जरूरी है। रजामंदी और वह भी सपा और विहिप में, तौबा-तौबा! वे राम वाले और वे रहीम वाले, दोनों का मेल क्योंकर हो सकता है। हां! इलाका बांटने के खेल की बात दूसरी है। माना कि फिक्सिंग करने वाले का फायदा फिक्सिंग की बुनियादी पहचान है। समाज सेवा के लिए फिक्सिंग कोई नहीं करता, न खेल में और न पॉलिटिक्स में। लेकिन, सिर्फ इसलिए कि इससे दोनों पार्टियों को चुनाव में थोड़ा-बहुत फायदा हो सकता है, इसे फिक्सिंग तो नहीं मान लिया जाएगा। हर फायदे की चीज फिक्सिंग नहीं होती। क्या खाद्य सुरक्षा फिक्सिंग है? तब अयोध्या यात्रा ही फिक्सिंग क्यों होगी? फिर यही क्यों मान लिया जाए कि तोगड़िया जी अंततः नरेंद्र जी का फायदा ही कराना चाहते होंगे।
अगर वाकई फिक्सिंग होती, तो यात्रा और परिक्रमा का इतना कन्फ्यूजन न होता। परिक्रमा कहते ही दुश्मन ले उड़े कि यह तो नई परंपरा डाल रहे हैं। अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा तो कब की हो चुकी। साल में दूसरी परिक्रमा नहीं होने देंगे! क्यों भाई? जब धूम-द्वितीय हो सकती है, जब आजादी की दूसरी, तीसरी लड़ाइयां हो सकती हैं, जब बार-बार चुनाव हो सकते हैं, तो परिक्रमा द्वितीय क्यों नहीं हो सकती? सच पूछिए, तो परिक्रमा का आइडिया ही गोल-गोल घूमने का है और यहां दूसरे फेरे पर ही फौजदारी हो रही है। खैर! सिर्फ यात्रा होती, तो यह बखेड़ा ही खड़ा न होता। हवाई जहाज से लेकर पैदल तक हर रोज यात्राएं होती ही हैं, उनमें कोई परंपरा खतरे में नहीं पड़ती है। पर यात्रा में परिक्रमावाली बात कहां? और यात्रा तक तो फिर भी ठीक था, पर चौरासी कोसी का क्या करते?
खैर! अगर फिक्सिंग है, तो फिक्सिंग ही सही। मियां-बीवी राजी, तो क्यों परेशान काजी?