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सैन्य अदालतों की जरूरत क्या है

मरिआना बाबर
Updated Thu, 17 Jan 2019 06:48 PM IST
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सैन्य अदालत

पाकिस्तान में संसद के बाहर और भीतर एक बहस यह चल रही है कि आतंकवादियों को सजा दिलाने के लिए सैन्य अदालतों को क्या और समय दिया जाना चाहिए या सभी मामलों को आतंकवाद-विरोधी अदालतों में भेजा जाना चाहिए? यह अजीब बात है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जहां सभी अदालतें काम कर रही हैं, और एक विशेष आतंकवाद-विरोधी अदालत भी है, वहां पाकिस्तान ने सैन्य अदालत स्थापित करने और आतंकवाद संबंधी मामलों को उसमें भेजने की इजाजत क्यों दी?



दिसंबर, 2014 में पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर बर्बर आतंकवादी हमले के बाद पाक संसद ने सैन्य अदालतें स्थापित करने की इजाजत दी। शुरू में इस असाधारण कदम का विरोध हुआ, लेकिन तब सैकड़ों छात्रों की आतंकवादियों द्वारा हत्या का शोक इतना बड़ा था कि जनवरी, 2015 में संसद ने इसकी इजाजत दे दी। हालांकि तब इसे एक अस्थायी कदम माना गया। दरअसल आतंकवादियों का खतरा इतना बड़ा था कि उन्हें अदालत में लाने के लिए उस समय यह फैसला किया गया कि सैन्य अदालतें ही इसका सबसे अच्छा जवाब है, क्योंकि शायद ही किसी गवाह को सुरक्षा उपलब्ध थी और जजों को भी अपनी जान का खतरा था। शुरू में इसकी समय सीमा दो साल तय की गई, लेकिन नवाज शरीफ सरकार के समय एक बार फिर महसूस किया गया कि इन सैन्य अदालतों को दो साल का समय और दिया जाए। 2019 में वह समय सीमा खत्म हो गई है।


कई देश, खासकर यूरोपीय संघ इस बात से खुश नहीं था कि पाकिस्तान ने मृत्युदंड पर से रोक हटा दी है। सरकार ने सैन्य अदालतों को जो 717 मामले भेजे थे, उनमें से 310 आतंकवादियों को मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन उनमें से 56 को ही सजा-ए-मौत दी गई।


नागरिक समाज की ओर से अनुरोध किया गया था कि सैन्य अदालतों को गैर-सैन्य पर्यवेक्षकों को कार्यवाही देखने की अनुमति देनी चाहिए, जिसकी कैमरे से रिकॉर्डिंग हो। लेकिन सेना इस पर सहमत नहीं हुई, जिससे कुछ तो पारदर्शिता आती। यह खासकर इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि जिन पर मुकदमा चलाया जा रहा है और जिन्हें सजा सुनाई जा रही है, वे नागरिक ही तो हैं।

 

सैन्य अभियानों में हजारों आतंकवादी मारे गए और कुछ महत्वपूर्ण आतंकवादी पुलिस या खुफिया विभाग के अभियानों में मारे गए, जिनमें लश्कर-ए झांगवी के मलिक इशाक जैसे कुछ खतरनाक आतंकवादी भी शामिल थे।


आज पाकिस्तान में कानून-व्यवस्था की स्थिति पहले से बेहतर है और आतंकी हमले बहुत कम होते हैं। इस वजह से अनेक लोग मानते हैं कि आतंकवादी मामलों को संभालने के लिए आतंकवाद-विरोधी अदालतों का समय आ गया है। हाल ही में पेशावर हाई कोर्ट ने सैन्य अदालतों द्वारा 70 लोगों को सजा दिए जाने के फैसले को निरस्त कर दिया, जो इस बात का संकेत है कि सैन्य अदालतों में कोई पारदर्शिता नहीं है।


प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए इंसाफ ने सैन्य अदालतों को और समय देने का फैसला किया है, लेकिन इसे कानूनी रूप देने के लिए संसद का समर्थन चाहिए। जबकि नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग और आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इस पर सहमत नहीं है।
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मुल्क भर में यह कहा जा रहा है कि कि उग्रवाद, आतंकवाद और हिंसक अतिवाद के खिलाफ लड़ाई आवश्यकता के अनुसार लंबे समय तक चलनी चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में देश को अपने सांविधानिक, लोकतांत्रिक और मौलिक अधिकारों को नहीं खोना चाहिए। एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चार साल के दौरान सैन्य अदालतों ने क्या न्यायिक क्षेत्र में सुधार में कोई मदद की है। ऐसा लगता नहीं है। दोष मुख्य रूप से न्यायपालिका में ही है। अगर न्यायपालिका इस दौरान सुधार की गंभीर शुरुआत करती, तो सैन्य अदालतों की जरूरत ही नहीं होती। उसने सरकार या संसद को कोई प्रस्ताव भी नहीं दिया, जिससे प्रांतीय और संघीय सरकार को अभियोजन में सुधार करने और गवाहों व न्यायाधीशों की रक्षा करने में मदद मिल सके।


राजनीतिक विश्लेषक मुशर्रफ जैदी कहते हैं, एक तरफ सैन्य अदालतें गठित करने का खर्च बरकरार है, दूसरी ओर, मुल्क की न्यायिक व्यवस्था में सड़ांध और क्षरण अंतहीन है। सैन्य अदालतों का लाभ यह हुआ कि मामलों की त्वरित सुनवाई हुई और पांच दर्जन से कम आतंकवादियों को फांसी दी गई। वह कहते हैं कि इस वाजिब चिंता का समाधान यही है कि अदालतों में सुधार किया जाए। शायद एक साथ सुधार भी मुश्किल होगा। वह सलाह देते हुए कहते हैं कि आतंकवाद विरोधी अदालतों में सुधार और पुनर्गठन बहुत ज्यादा थकाऊ क्षेत्र है।

 

अब चूंकि पीटीआई गठबंधन सरकार संसद में सैन्य अदालतों को और समय देने की तैयारी कर रही है, इसलिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण भी हो रहा है। पीएमएलएन और पीपीपी पर भारी दबाव है, जिनके नेता सलाखों के पीछे हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले चल रहे हैं। क्या ये दोनों पार्टियां अपने सांसदों को सैन्य अदालतों को और समय देने के लिए वोट देने की इजाजत देंगी? समय विस्तार के लिए मतदान करके ये दोनों राजनीतिक दल सुरक्षा प्रतिष्ठान को यह संकेत भी देंगे कि वे अदालतों से कुछ राहत की उम्मीद करते हैं।


मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि ये पार्टियां सत्तारूढ़ दल के साथ वोट करेंगी, क्योंकि उन्होंने देखा है कि नवाज शरीफ जैसे प्रधानमंत्री के साथ क्या हुआ, जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान सेना के खिलाफ अभियान चलाया था। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगा कि संसद सैन्य अदालतों को और दो साल का समय देगी या उससे कम। पर एक बात तो साफ है कि जब तक इस समय विस्तार पर रोक नहीं लगती, तब तक न्यायपालिका अपने में सुधार नहीं कर पाएगी और आतंकवादियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने की चुनौती स्वीकार नहीं कर पाएगी। दोनों विपक्षी पार्टियों और मौजूदा सरकार को आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा प्रतिष्ठान से राहत मिल भी सकती है और नहीं भी, लेकिन सैन्य अदालतों को और समय देने से लोकतंत्र व कानून का शासन कमजोर होगा।

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