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इस न्योते का मतलब क्या है

Thu, 22 May 2014 06:43 PM IST
ऐलन बेरी
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भारत के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले हफ्ते प्रधानमंत्री पद के लिए होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में शरीक होने के लिए पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रण भेजा है। उनके इस अनोखे फैसले से लोगों की इन उम्मीदों को बल मिला है कि भारत में सत्ता परिवर्तन से पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधरेंगे। हिंदू राष्ट्रवादी नेता मोदी ने, जिन्होंने अपने चुनाव अभियान के दौरान विश्व मंच पर भारत की दमदार उपस्थिति दर्ज कराने का वायदा किया था, अपने सभी पड़ोसी देशों के नेताओं को निमंत्रित कर एक नई पहल की है। अब तक शपथ ग्रहण समारोह न केवल छोटे स्तर पर होते थे, बल्कि ऐसे आयोजनों में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का ही जमावड़ा होता था। मगर मोदी ने यह पहल कर पड़ोसी देशों के बीच भारत के नेता बनकर उभरने का संकेत दिया है।
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इसके बावजूद उन नवाज शरीफ को आमंत्रित करना आश्चर्यजनक है, जिन्होंने पद संभालने के बाद से अब तक भारत की आधिकारिक यात्रा नहीं की है। हालांकि दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते सुधारने की कोशिश पिछले वर्ष मनमोहन सिंह ने की थी, लेकिन सीमा पर पाक सेना की नापाक हरकतों की वजह से वह विफल रहे थे। मृदुभाषी मनमोहन सिंह ने तब यह घोषणा की थी कि ऐसी कायराना हरकत के बाद पाकिस्तान से वार्ता मुमकिन नहीं है। पर अब पाकिस्तान को उम्मीद है कि मजबूत छवि वाले मोदी और भाजपा भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बहाल करने का मौका अपने हाथ से जाने नहीं देंगे। इससे पहले 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के समय दोनों देशों के बीच रिश्तों में कुछ सुधार आया था।

अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं, ‘वाजपेयी के साथ हमारे रिश्ते बहुत अच्छे थे। कांग्रेस ने पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ता बनाने में हमेशा ही उदासीनता दिखाई, क्योंकि वैसे में उसे दक्षिणपंथी भाजपा की खुली आलोचना का सामना करना पड़ता। मगर भाजपा को कभी ऐसी आलोचना का सामना नहीं करना पड़ेगा।’
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भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर हाल में लिखी गई एक पुस्तक के लेखक स्टीफेन पी कोहन के मुताबिक, मोदी के बुलावे को शरीफ स्वीकार तभी स्वीकार करेंगे, जब उन्हें पाकिस्तान की ताकतवर सेना का समर्थन हासिल होगा। कोहन कहते हैं, ‘हमें जल्द ही मोदी और शरीफ के बीच आधिकारिक वार्ता देखने को मिल सकती है। मगर शरीफ की दिक्कत जहां उनकी सेना है, वहीं दक्षिणपंथी विचारधारा मोदी के लिए अड़चन है।’

नवीज शरीफ को आमंत्रण देने की पहल को नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। सीमा पर पाकिस्तान के साथ तनातनी के बावजूद उसके साथ उच्च स्तर पर संबंध बनाए रखने के लिए, पूरे चुनावी अभियान के दौरान मोदी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार पर तीखे हमले किए। एक बार तो उन्होंने यहां तक कहा, ‘वह हमारे सैनिकों के सिर काट रहे हैं, और हम उनके प्रधानमंत्री को चिकन बिरियानी परोस रहे हैं।’

मोदी जिन विदेश नीति विशेषज्ञों से घिरे हैं, उनकी नीति आक्रमणकारी मानी जाती है। इन्हीं में से एक पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक लेख के जरिये अपने नेता को सलाह दी कि एक मजबूत विदेश नीति बनाने के लिए वह अपनी सेना को मजबूत बनाएं, और परमाणु निःशस्त्रीकरण की मांग के बजाय अपने रणनीतिक कार्यक्रमों को ज्यादा तवज्जो दें।

लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अपने महत्वाकांक्षी विकास एजेंडे को पूरा करने के लिए मोदी को बाजारों को खोलकर और पूरे उपमहाद्वीप में अबाधित व्यापार सुनिश्चित कर पड़ोसियों के साथ रिश्ते मधुर बनाने होंगे। विदेश नीति विश्लेषक सी राजामोहन कहते हैं, ‘कट्टर छवि के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने मोदी पर भरोसा जताया है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि मोदी पाकिस्तान से लड़ाई छेड़ने जा रहे हैं। वह यह दिखाना चाहते हैं कि उनमें देश चलाने की क्षमता है, और भारत के क्षेत्रीय हितों को पूरा करने के लिए वह कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं।’

गौरतलब है कि कांग्रेस के एक प्रवक्ता समेत कश्मीर राज्य की सरकार व विपक्षी दलों ने भी शरीफ को आमंत्रित करने के फैसले की तारीफ की है। कश्मीर में विपक्ष की नेता मेहबूबा मुफ्ती कहती हैं, ‘यह एक अच्छी शुरुआत है, और अगर मोदी पाकिस्तान के साथ रिश्तों को मजबूत बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं, तो वह इतिहास में जगह बना लेंगे।’ वहीं इस्लामाबाद के एक विशेषज्ञ रसूल बख्श रईस के मुताबिक, शरीफ हमेशा भारत के साथ बेहतर रिश्ते को पाकिस्तान के विकास के लिए जरूरी मानते आए हैं, मगर यहां उनकी चिंता पाकिस्तान के सुरक्षा इंतजाम को लेकर है। वह कहते हैं, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे हिंदू अतिवादी संगठनों की तुलना में मोदी ज्यादा यथार्थवादी हैं। और वैसे भी, राजनीतिक भाषा का उपयोग कर सत्ता हासिल करना एक बात है, और सत्ता में आकर नीतियां बनाना, दूसरी बात।’

पाकिस्तान में भारत के राजदूत रहे जी पार्थसारथी नवाज शरीफ को न्योता भेजने के फैसले से ज्यादा उम्मीद न रखने की बात कहते हैं। उनकी राय है, ‘बेशक हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में शपथ ग्रहण के मौके पर पड़ोसियों को बुलाने का फैसला कभी नहीं लिया गया। लेकिन भारत की बाह्य सुरक्षा से पूरी तरह संतुष्ट हुए बगैर मोदी पाकिस्तान से संवाद कायम नहीं करेंगे। उन्होंने पड़ोसी देशों को न्योता भेजकर यह संदेश दिया है कि पुराने विवादों को दूर करते हुए आर्थिक एकीकरण का समय आ गया है।’
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