एक दिन, दशरथ के सारथी एवं मित्र सुमंत्र ने उन्हें बताया कि बहुत पहले भगवान सनत्कुमार ने यह भविष्यवाणी की थी कि विभांडक-पुत्र महर्षि ऋष्यशृंग के प्रताप से अकाल से पीड़ित अंग राज्य में वर्षा हुई थी। इसलिए ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न कराने के उपरांत ही दशरथ को संतान की प्राप्ति होगी। यह सुनकर राजा दशरथ ने अंग राज्य पहुंचकर ऋष्यशृंग से यज्ञ करवाने का अनुरोध किया। ऋष्यशृंग ने यज्ञ करने की सहमति दी और वह दशरथ के साथ अयोध्या आ गए। अयोध्या पहुंचने पर यज्ञ आरंभ कर दिया गया। यज्ञ में अपना भाग लेने वाले देवताओं ने भगवान ब्रह्मा को बताया कि तीनों लोक राक्षसराज रावण के अत्याचार से पीड़ित हैं। तब ब्रह्मा ने कहा कि रावण, मनुष्य को तुच्छ समझता है, इसलिए उसका अंत मनुष्य के हाथों से ही होगा। उसी समय भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने देवताओं को वचन दिया कि वह दशरथ के पुत्र बनकर धरती पर मनुष्य के रूप में जन्म लेंगे और रावण का अंत करके सृष्टि को अधर्म से मुक्ति दिलाएंगे और धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे।
ऋष्यशृंग ने पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त किया, तो यज्ञ की अग्नि में से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसके हाथों में दिव्य खीर से भरा पात्र था। उस दिव्य पुरुष ने खीर से भरा पात्र दशरथ को देकर अपनी रानियों को खिला देने को कहा।
राजा दशरथ, खीर का पात्र लेकर तीनों रानियों के पास पहुंचे। उन्होंने खीर का पहला भाग कौसल्या को दिया, फिर बची हुई आधी खीर में से आधा भाग सुमित्रा और कैकेयी में बांट दिया। फिर भी पात्र में कुछ खीर बची रह गई थी, तो सोच-विचारकर दशरथ ने अवशिष्ट खीर फिर से सुमित्रा को दे दी। इस प्रकार कौसल्या तथा कैकेयी को खीर का एक-एक भाग मिला, किंतु सुमित्रा को खीर के दो भाग प्राप्त हुए। आश्चर्य की बात यह थी कि इसी के अनुसार, तीनों रानियों को संतान प्राप्त हुईं।
समय बीता, तो तीनों रानियां गर्भवती हो गईं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में दशरथ के राज्य में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। तीनों रानियों ने चार पुत्रों को जन्म दिया। कौसल्या ने चैत्र मास की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में एक पुत्र को जन्म दिया, जो समस्त शुभ लक्षणों से युक्त था। उसी दिन, कैकेयी ने भी पुष्य नक्षत्र में एक पुत्र को जन्म दिया। चूंकि सुमित्रा को खीर के दो भाग प्राप्त हुए थे, इसलिए उन्होंने दशमी तिथि को आश्लेष नक्षत्र में दो पुत्रों को जन्म दिया। राजकुमारों के जन्म के ग्यारहवें दिन, महर्षि वशिष्ठ ने उनका नामकरण संस्कार किया। उन्होंने कौसल्या-पुत्र के लिए कहा, ‘यह बालक संपूर्ण पुरुष के समस्त शुभ लक्षणों से संपन्न है। इसके व्यवहार में करुणा और भुजाओं में शक्ति है। यह अपने सद्गुणों से संसार में यश अर्जित करेगा। इसका नाम ‘राम’ होगा।’ कैकेयी के पुत्र का नाम ‘भरत’ होगा। इसके बाद वशिष्ठ ने सुमित्रा के पुत्रों के नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न रख दिए। इस प्रकार, राजा दशरथ की निराशा दूर हुई और उनके घर में चार वीर पुत्रों का आगमन हुआ। राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने न केवल अपने पिता की आशाओं को पूरा किया, अपितु वे एक-दूसरे के साथ प्रगाढ़ स्नेह और प्रेम से बंधे हुए थे।
चूंकि श्रीराम का जन्म चैत्र माह की नवमी तिथि को हुआ था, इस कारण इस दिन को आज तक रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। श्रीराम, भगवान विष्णु का अवतार थे, जिन्होंने संसार को राक्षसराज रावण के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने और धर्म की स्थापना करने के लिए जन्म लिया था, अत: रामनवमी का पर्व, भगवान श्रीराम के जन्म के साथ-साथ धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक भी माना गया है। हिंदू नववर्ष के साथ आरंभ होने वाले चैत्र नवरात्र का समापन रामनवमी के साथ हो जाता है।