मैंने उनसे पूछा, आप कैसे हैं?
उन्होंने कहा, अच्छे हैं, ठीक हैं।
सामान्यतः होता यह है कि सामनेवाले से जब आप इस तरह का सवाल पूछते हैं, तो वह भी आपसे पूछ लेता है, और आप भी ठीक हैं न। और इस तरह मामला शुरू होकर तत्काल खत्म हो जाता है।
खैर कारण जो भी रहा हो, उन्होंने मुझसे मेरा हाल नहीं पूछा, तो मैंने सोचा, चलो आज थोड़ी-सी चुहल हो जाए। मैंने कहा, आपसे जब आठ दिन पहले मैं मिला था, तब भी आपने कहा था कि अच्छे हैं। उससे पंद्रह दिन पहले भी आपने यही कहा था। करीब महीनेभर पहले भी आपने ऐसा ही कहा था। यानी आप हमेशा अच्छे रहते हैं।
मेरा अंतिम वाक्य सुने बिना वह तमतमा गए। उन्होंने तीखा जवाब दिया, तो आप मेरे मुंह से क्या यह सुनना चाहते थे कि मैं ठीक नहीं हूं? आप तो जी मेरे बहुत बड़े शुभचिंतक हैं, आपको पाकर तो आज मैं धन्य हो गया! इसके बाद भी वह चुप नहीं हुए। कहा, कृपया अगली बार से आप मुझसे कुछ मत पूछिएगा, वरना मैं वह जवाब दूंगा कि आपको अपनी दादी-नानी-चाची ही नहीं, चाचा-दादा-नाना तथा और भी जितने हैं, सब एक साथ याद आ जाएंगे।
उनका चेहरा सुर्ख लाल हो चुका था। लग रहा था, अब मैंने एक भी शब्द बोला, तो वह और तो कुछ नहीं करेंगे, मगर रो पड़ेंगे और यहां तमाशा बन जाएगा। फिर भी मैंने ठंडा पानी डालने की कोशिश करते हुए कहा, आप तो एकदम से बुरा मान गए, मेरा मतलब यह नहीं था...
उनका ताजे नोट की तरह करारा जवाब आया, तो अब तुम मुझे भाषा सिखाओगे, ये दिन आ गए हैं मेरे? कहते हो, आप एकदम से बुरा मान गए। अरे तो क्या तुमसे इजाजत लेकर मानें कि हुजूर परमीशन दे दीजिए? आखिर तुम्हारी मंशा क्या है?...
वह आपसे तुम पर आ गए थे। खैर जो हुआ, सो हुआ, मगर आप बताइए कि आप ठीक हैं, मैं ठीक हूं, यह पूछने में क्या धरा है? अरे हम 21वीं सदी के मनुष्य इससे आगे भी कभी बढ़ेंगे या अच्छे हैं, ठीक हैं कहते हुए जिंदगी गुजार देंगे?- यह कहना चाहता था मैं उनसे। उन्हें नाराज कर गया। कोशिश तो मैं करूंगा उन्हें यह बात समझाने की, वरना किसी दिन आप उन्हें समझा देना।