भारत की कहानी सवालों और जवाबों में उलझकर रह गई है। धारणा को मंदी के जोखिम से चुनौती मिल रही है। पिछले हफ्तों के दौरान 2019-20 में जीडीपी की विकास दर को कम कर सात फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किए जाने के बीच दीर्घकाल में विकास दर के सात फीसदी से अधिक रहने का वादा कायम है।
राजनीतिक नेतृत्व वह सब कह रहा है, जो आकांक्षी भारत उससे सुनना चाहता है। लेकिन क्या नीति तंत्र वह सब कर रहा है, जिसकी जरूरत है? तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था आवश्यकता और अनुकूल परिस्थितियों के संधि स्थल पर खड़ी है। जनसांख्यिकी में अंतर्निहित विकास के अवसर- और कच्चे तेल की कम कीमत या फिर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों की मेहरबानी से आसान रिटर्न जैसे अवसर का लाभ उठाने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत है।