फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बीएचयू की लड़कियों ने जो किया

Thu, 28 Sep 2017 06:57 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
विज्ञापन
सुभाषिनी सहगल अली
विज्ञापन
चेन्नई आईआईटी, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, जेएनयू, एफटीटीआई – पिछले तीन वर्षों की सुर्खियों और चैनलों पर ‘विचार-विमर्श बनाम गाली-गलौज’ पर छाए हुए थे। इन तमाम परिसरों में चलने वाले धरने, प्रदर्शन, अभियान और आंदोलन के मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों से संबंधित थे- मृत्युदंड, जातीय उत्पीड़न, शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप, बोलने-पढ़ने-लिखने-विरोध करने की स्वतंत्रताओं पर रोक, राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह। इनके नेता भी अधिकतर नौजवान लड़के थे। पर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में एक अलग तरह का विस्फोट देखने को मिला।
विज्ञापन

 
यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है, जिसे निश्चित तौर पर राष्ट्रीय मुद्दा बनना चाहिए। इसकी चर्चा जहां भी शुरू की जाती है, तो उसे दबाने की तरह-तरह की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। ऐसी कोशिशें जो भौंडी भी होती हैं, तंज भरी भी। यह राष्ट्रीय शर्म का मुद्दा है और इसीलिए इसे छिपाए रखने का प्रयास हजारों वर्षों से चल रहा है। परंपराएं, वर्णव्यवस्था, संस्कार, आर्थिक उत्पीड़न, निजी संपत्ति की बुनियाद, इन सबको इससे खतरा है। इसीलिए इसे दबाने की इतनी जबरदस्त कोशिश समाज के हर हिस्से में चल रही है।

और इसी मुद्दे पर पड़े हजार पर्दों को चीरकर उसके भयानक, बेहूदे और लीचड़ चेहरे का पर्दाफाश करने का काम दिल्ली या मुंबई, या कोलकाता, या बंगलूरू या और किसी बड़े शहर की लड़कियों ने नहीं, बल्कि अधिकतर उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाली आम परिवारों की बहादुर बेटियों ने किया।
विज्ञापन


बीएचयू में कई साल पहले पढ़ने वाली एक महिला लिखती है: 'यहां पहरा है, पहरा है लड़कियों पर, पहरा है उनके कपड़ों पर, पहरा है प्यार पर, पहरा है मर्जी पर।' वह आगे लिखती हैं, 'यहां सामान्य बात है, कैंपस के अंदर घटिया कमेंट देना, छेड़छाड़ करना। यहां सामान्य बात है, लड़की के साथ कुछ भी हो, तो उसे ही लेक्चर दे देना...।' एक सीनियर स्टूडेंट ने बताया कि अंदर वाले घटिया कमेंट करके रह जाते हैं, लेकिन बाहर वाले छूना, घटिया गाली देना इत्यादि सब करते हैं। इन सबके बाद प्रशासनिक और शैक्षणिक पदों के शीर्ष पर बैठी महिलाएं कभी ‘बेटी’ बोलकर तो कभी डराकर कहती हैं पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम लोग ठीक कपड़े पहना करो, मां-बाप ने इतनी दूर क्यों भेजा।'

यह तो पहले भी होता था, आज भी होता है। नई बात क्या है? अबकी बार छात्राओं ने हाथ बढ़ाकर सत्ता और सत्ताधारियों की दुखती नफस को पकड़ लिया। उन्होंने इस बात को बार-बार कहा कि हमारी सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी है। हमारा उत्पीड़न करने वालों पर कार्रवाई करना आपकी जिम्मेदारी है। हमें अपने साथ होने वाली बदसलूकी और किसी तरह के शोषण के लिए जिम्मेदार ठहराना अब बिल्कुल मंजूर नहीं है। लड़कियों ने अद्भुत एकता का परिचय देते हुए उस झूठ को दफना दिया कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं। उन्होंने नारे लगाए। न्याय की गुहार लगाई। जब पिता का देहांत होता है, तो बेटे अपने सिर के बाल घोट देते हैं। यह केवल उनके शोक का प्रतीक नहीं, बल्कि इस बात का एलान भी है कि पुराना मुखिया नहीं रहा, लेकिन घर का नया मुखिया नियुक्त कर दिया गया है। बीएचयू की छात्राओं ने भी यही किया। जिस लड़की के साथ बदतमीजी हुई थी, उसने अपनी बात कुलपति से कहने की कोशिश की थी, जिसकी उन्होंने अनसुनी कर दी। उसने अपना सिर घोट दिया। उसके लिए पुराने मुखिया सब समाप्त हो चुके थे। उनकी जगह नई शक्तियां, जिनमें लंबे अरसे के बाद, महिलाओं की शक्ति भी शामिल थी, लेने की तैयारी में थे, इसका सार्वजनिक एलान कर रहे थे। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें