भारतीय उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े के साथ न्यूयॉर्क में कुत्सित, शर्मनाक, दुखद और बर्बर व्यवहार अन्य देशों के गणमान्य व्यक्तियों, राजनयिकों एवं उच्च अधिकारियों से जुड़े मामलों से निपटने में अमेरिका द्वारा अपनाए जाने वाले दोहरे मानदंड का ही एक और उदाहरण है। इससे पहले सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी हवाई अड्डों पर भारत के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, भारतीय राजदूत मीरा शंकर और संयुक्त राष्ट्र में पूर्व भारतीय प्रतिनिधि हरदीप पुरी की गहन तलाशी ली गई थी।
आखिर अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को देवयानी से कैसा खतरा था कि उन्हें उनके बच्चों के स्कूल के सामने सार्वजनिक रूप से हथकड़ी लगाई गई, यौनकर्मियों एवं नशेड़ियों के बीच बिठाया गया और कपड़े उतरवाकर उनकी तलाशी ली गई? यह चौंकाने वाला है, क्योंकि उन पर अपनी घरेलू नौकरानी को अमेरिका में श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देने का आरोप लगाया गया।
क्या यह इतना संगीन अपराध था कि उन्हें अदालत के सामने पेश होने के लिए नहीं कहा जा सकता था? क्या भारत स्थित अमेरिकी दूतावास और वाणिज्य दूतावास भारतीय कर्मचारियों को सख्त अमेरिकी श्रम कानून के तहत निर्धारित प्रति घंटे 9.75 डॉलर की न्यूनतम मजदूरी देते हैं?
क्या अमेरिकी सरकार अन्य देशों से उनके अपने घरेलू कानूनों के अनुसार अमेरिकी राजनयिकों और अधिकारियों के साथ व्यवहार की अपेक्षा करती है? लाहौर में दो लोगों की हत्या करने वाले सीआईए एजेंट रेमंड डेविस के साथ पाकिस्तानी पुलिस एवं वहां की अदालत ने जो व्यवहार किया था, क्या अमेरिकी सरकार उससे खुश थी? अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय में जाने से परहेज क्यों किया? क्या इसकी यह वजह नहीं है कि अमेरिकी सरकार नहीं चाहती कि उसके सैनिक किसी विदेशी कानून के उल्लंघन के मामले में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय में मुकदमों का सामना करें?
अमेरिकी विदेश विभाग के राजनयिक सुरक्षा प्रभाग ने देवयानी मामले में उचित कार्रवाई नहीं की और कहा कि वह इस दुर्व्यवहार के लिए उत्तरदायी नहीं है। क्या इस मामले को निपटाने के लिए यही एकमात्र मानक 'प्रक्रिया' थी? सभी जानते हैं कि अमेरिकी नागरिकों, सैनिकों एवं राजनयिकों द्वारा कानूनों के उल्लंघन पर अगर दूसरे देश भी उनके साथ मानक प्रक्रिया अपनाना शुरू करें, तो क्या होगा।
भारत सरकार ने इस घटना पर फौरन प्रतिक्रिया जताई और अमेरिकी राजदूत को तलब कर तीखा विरोध दर्ज कराया। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, सबने देवयानी प्रकरण के खिलाफ विरोध जताने के लिए अमेरिका के पांच सदस्यीय शिष्टमंडल से मिलने से इन्कार कर दिया।
इतना ही नहीं, गहरी 'रणनीतिक साझेदारी' के मद्देनजर अमेरिकी राजनयिकों एवं वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों को जो अतिरिक्त सुविधाएं दी गई थीं, वे सभी हमारी सरकार ने वापस ले लीं। इसके तहत अमेरिकी दूतावास के आसपास लगे सुरक्षा अवरोधकों को हटा लिया गया, अमेरिकी राजदूतों एवं वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों को पहचान पत्र सौंपने के लिए कहा गया और अमेरिकी दूतावास को कहा गया कि वे अपने यहां कार्यरत भारतीय कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन का ब्योरा दें।
बेशक दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों द्वारा इस घटना के समग्र द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए कदम उठाए जाने की संभावना है, लेकिन वास्तव में यह घटना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक चेतावनी है कि वे राजनयिकों एवं वाणिज्य दूतों को विशेषाधिकार मुहैया कराने वाले पुराने कानूनों पर गंभीरता से विचार करें।
राजनयिकों एवं वाणिज्य दूतों को विशेषाधिकार प्रदान करने वाली वियना संधि करीब पचास वर्ष पुरानी है। तब से लेकर अब तक वक्त बदल गया है, इसलिए राष्ट्रों की एक समान संप्रभुता के आधार पर उन कानूनों को फिर से लिखने की तत्काल आवश्यकता है। देवयानी प्रकरण को द्विपक्षीय उपायों, खेद प्रकट करने और मामले के शांतिपूर्ण समाधान से नहीं खत्म होना चाहिए। बदली हुई वैश्विक सत्ता संरचना तथा शीतयुद्ध व 9/11 के बाद की दुनिया में भू-राजनीतिक मांग के तहत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की मौजूदा स्थिति दर्शाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों समेत राजनयिकों एवं वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों के प्रति बरते जाने वाले व्यवहार से संबंधित कानूनों एवं संधियों में सुधार वक्त की मांग है।
यहां सतर्कता का एक लफ्ज महत्वपूर्ण है। भले ही देश की लोकप्रिय भावना को ध्यान में रखते हुए हमारी सरकार ने जो त्वरित प्रतिक्रिया जताई, वह स्वागतयोग्य है, लेकिन इस मामले के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए तत्काल उपाय जरूरी हैं। अमेरिका को 'मानक प्रक्रिया' के नाम पर दूसरे देशों को धमकाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि मामले के निपटारे के लिए उसे कम से कम माफी मांगने, देवयानी के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने और श्रम कानूनों व राजनयिक कर्मचारियों के वेतन एवं सुविधाओं से संबंधित मामलों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
जिन मार्शलों ने देवयानी के साथ दुर्व्यवहार किया, उन्हें समुचित रूप से दंडित करने की जरूरत इसलिए है कि उन्हें जितना कहा गया था, उन्होंने उससे अधिक बर्बरता का परिचय दिया। गौरतलब है कि कथित पीड़िता संगीता रिचर्ड फरार है और दिल्ली उच्च न्यायालय में उसके खिलाफ एक मामला लंबित है। यह कैसे संभव है कि वह तो अमेरिका में स्वतंत्र रूप से घूमे, जबकि एक उप महावाणिज्य दूत को गिरफ्तार कर हथकड़ी पहनाकर घंटों तक अपराधियों के साथ बिठाए रखा जाए?