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किसे सुध है झंडागान के रचयिता की

Mon, 12 Aug 2013 08:29 PM IST
ज्ञानेंद्र रावत
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इन दिनों देश की आजादी की 66वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियां चल रही हैं। वर्तमान दौर में राष्ट्र एक तरफ दूरदर्शी प्रतीक पुरुषों की तलाश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जिन लोगों के संघर्ष और बलिदान की बदौलत हमें आजादी का यह बहुमूल्य उपहार मिला, उन्हें याद करने की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है।
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भारत माता के ऐसे ही एक सपूत थे, श्यामलाल गुप्त 'पार्षद', जिन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान क्रांतिवीरों में अपने गीतों के माध्यम से नया जोश भरने का काम किया और राष्ट्र को झंडा गीत दिया। मगर विगत दस अगस्त को उनकी पुण्यतिथि गुजर गई, लेकिन कहीं उनके योगदान की चर्चा तक नहीं हुई।

16 सितंबर,1893 को कानपुर जिले के नरबल कस्बे के एक साधारण व्यवसायी विशेश्वर गुप्त के घर में जन्मे श्यामलाल पांच भाइयों में सबसे छोटे थे। परिवार की आर्थिक दशा अच्छी न होने की वजह से जैसे-तैसे मिडिल की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने विशारद की उपाधि हासिल की। उन्हें जिला परिषद एवं नगरपालिका में अध्यापक की नौकरी मिली भी, लेकिन जब दोनों जगहों पर तीन साल का बांड भरने की नौबत आई, तो उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
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वर्ष 1921 में जब वह गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, तो फतेहपुर को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। उन्होंने नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में भी भाग लिया। फतेहपुर में वह रानी असोधर के महल से असहयोग आंदोलन शुरू करने के आरोप में गिरफ्तार होकर जेल गए। एक व्यंग्य रचना लिखने के अपराध में उन पर 500 रुपये का जुर्माना भी लगा। वर्ष 1924 में जब स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था, तब उन्होंने झंडागान की रचना की, जिसे कांग्रेस ने स्वीकारा और 1925 में कानपुर कांग्रेस में यह गीत ध्वजारोहण के दौरान पहली बार सामूहिक रूप से गाया गया।

श्यामलाल गुप्त द्वारा लिखित झंडा गीत इस प्रकार है-विजयी विश्व तिरंगा प्यारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा/ सदा शक्ति बरसाने वाला/ वीरों को हरषाने वाला/ शांति सुधा सरसाने वाला/ मातृभूमि का तन-मन सारा/ झंडा ऊंचा रहे हमारा। आजादी के आंदोलन में इस गीत ने देश के जनमानस में चेतना जगाने का महत्वपूर्ण काम किया। इस गीत की तीसरी पंक्ति में गांधीजी ने शांति के स्थान पर प्रेम शब्द जोड़ा। यह गीत ब्रिटिश हुकूमत की आंखों की किरकिरी बना रहा, लेकिन आजादी मिलने के बाद इसे भुला दिया गया। वर्ष 1930 में नमक आंदोलन में भी वह गिरफ्तार होकर जेल गए। 1932, 1942 और 1944 में तो वह लंबे समय तक भूमिगत रहे। अपनी राजनीतिक सक्रियता के दौरान उनका संपर्क पुरुषोत्तम दास टंडन, मोतीलाल नेहरू, महादेव देसाई व पंडित रामनरेश त्रिपाठी से भी रहा।

समाज के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने कानपुर में गंगादीन-गौरीशकंर विद्यालय की स्थापना की, जो अब दोसर वैश्य इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इस कॉलेज की पत्रिका का भी वर्षों संपादन किया। उन्होंने एक अनाथालय और एक बालिका विद्यालय की भी स्थापना की। देश से उन्हें कितना प्यार था, यह उनके अग्रलिखित गीत से प्रकट होता है। यह गीत गुप्तजी ने 12 मार्च, 1972 को लखनऊ के कात्यायनी कार्यालय में सुनाया था-देख गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं/आज चिंतित हो रहा हूं/बोलना जिनको न आता था, वही अब बोलते हैं/रस नहीं वह देश के, उत्थान में विष घोलते हैं।

श्यामलाल गुप्त इतने स्वाभिमानी थे कि जीवन भर अभावों में रहने के बावजूद कभी किसी से याचना नहीं की। यहां तक कि अर्थाभाव के कारण ही वह अपना इलाज नहीं करा सके और 10 अगस्त, 1977 की रात इस दुनिया से विदा हो गए। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने 23 साल तक लगातार राष्ट्रीय झंडा को उठाये रखा, उसके सम्मान में एक दिन भी झंडा झुकाया नहीं गया।

यह विद्रूप ही है कि जिस व्यक्ति के लिखे गीत भीड़ को अनुशासित सैनिकों में बदलने की क्षमता रखते थे, उस भारत मां के अमर सपूत को आज देश के कर्णधार भूल चुके हैं। देश का नेतृत्व भले ही श्यामलाल गुप्त के योगदानों को भुला दे, लेकिन आजादी की लड़ाई के इतिहास में उनका नाम सदा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा और राष्ट्रप्रेमियों के हदय में उनका झंडागीत गूंजता रहेगा।
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