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बंगाल में सियासत का नया मोर्चा: वोट बैंक की आग, राज्य की शांति दांव पर

अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Tue, 23 Dec 2025 05:18 AM IST

सार

तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर के नई पार्टी के गठन के ऐलान के बाद ध्रुवीकरण जैसी स्थितियां बन रही हैं और एआईएमआईएम से जैसे संकेत मिल रहे हैं, उससे देखने वाली बात होगी कि अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल की राजनीति किस तरफ मुड़ रही है।
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टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर। - फोटो : ANI


गौरतलब है कि हुमायूं पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट से विधायक हैं, जिन्हें बाबरी जैसी मस्जिद की नींव रखने से पहले ही तृणमूल कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया था। हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब हुमायूं कबीर ने अपने सांप्रदायिक इरादों को जाहिर किया हो। 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने कहा था कि मुर्शिदाबाद में 70 फीसदी मुस्लिम हैं और हिंदू केवल 30 फीसदी। 


राजनीतिक दल बनाने से किसी को भी रोका नहीं जा सकता, लेकिन देखने वाली बात यह है कि इसके पीछे कौन-से विचार काम कर रहे हैं। बांग्लादेश में जिस तरह से भारत-विरोध भड़क रहा है, उससे सीमा पर घुसपैठ का खतरा बढ़ सकता है। ठीक इसी समय सीमावर्ती जिले मुर्शिदाबाद में पुराने विवादों को फिर से उछालने और नई पार्टी बनाकर मुस्लिम वोटों को लामबंद करने की कोशिश राज्य को अशांति की आग में झोंकने वाला कदम भी हो सकता है।


खुद को बंगाल का ओवैसी बताने के साथ हुमायूं यह दावा भी कर रहे हैं कि एआईएमआईएम के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी उनके साथ गठबंधन करने को राजी भी हो गए हैं। 


उल्लेखनीय है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन किसी भी सीट पर उन्हें जीत नहीं मिली थी। हालांकि हुमायूं कबीर का वास्तविक जनाधार अभी परखा जाना बाकी है, लेकिन अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में किंगमेकर होने की उनकी घोषणा ने सत्तारूढ़ तृणमूल को असहज तो किया ही है। बंगाल की तृणमूल सरकार अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के नाम पर वोट बैंक बनाए रखने की कोशिश करती रही है, पर हुमायूं कबीर सरीखे नेता इसे चरम पर ले जाकर पूरे राज्य को अशांति की ओर धकेल रहे हैं। 


केंद्र की तो पूरे घटनाक्रम पर नजर होगी ही, यह बंगाल की जनता को भी समझना होगा कि बांग्लादेश जैसे हालात यहां न पैदा हों। बंगाल में शांति व विकास तभी संभव है, जब वोट बैंक की राजनीति पर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। यह पूरा प्रकरण बंगाल की राजनीति और उसके नेताओं के लिए भी एक चेतावनी है। चुनाव नजदीक है, इसलिए सियासी तापमान बढ़ना तय है। लेकिन, राज्य के सामाजिक ताने-बाने को दांव पर लगाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे कोई भी दल स्थायी लाभ नहीं कमा सकता।
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