फुटबाल विश्वकप का इतिहास देखें, तो उम्मीद तो बंधती है। मुसोलिनी के शासन के दौरान 1934 में इटली में हुआ विश्वकप हो या फिर 1938 की प्रतिस्पर्धा, जब जर्मनी, ऑस्ट्रिया पर कब्जा कर चुका था, इस खेल ने दर्द से कराहते देशों को कुछ राहत दी थी। शीतयुद्ध के दौर में भी यह खेल संवाद का एक मंच बना था। इसी तरह, 2010 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्वकप ने रंगभेद के अतीत से बाहर निकल रहे देश को वैश्विक पहचान और आत्मविश्वास प्रदान किया। इस तरह फुटबाल के खेल ने हमेशा यह संदेश दिया कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद साझा मानवीय भावनाएं किसी भी राजनीतिक मतभेद से बड़ी हो सकती हैं। लेकिन 48 टीमों और 104 मैचों वाला कल से शुरू हुआ फीफा विश्वकप कुछ अलग है। टिकट की कीमतों और अमेरिका के सख्त प्रवासन नियमों को लेकर देशों में नाराजगी है।
अमेरिका की मेजबानी में ईरान की टीम को खेलते देखना दिलचस्प होगा, जिसने मेक्सिको को अपना ठिकाना बनाया है। उल्लेखनीय है कि ईरानी खिलाड़ी जब मेक्सिको पहुंचे, तो उन्होंने वह प्रतीक चिह्न पहना था, जो स्कूल पर हुए घातक मिसाइल हमले के पीड़ितों की याद दिलाता है। जाहिर है कि ताजा विश्वकप सिर्फ खेल का आयोजन नहीं, बल्कि सहयोग की एक बड़ी परीक्षा भी है। विश्वकप जैसे आयोजन हमेशा राष्ट्रीय गौरव, आर्थिक हितों और कूटनीतिक संदेशों से जुड़े रहते हैं, इसलिए यह अपेक्षा करना कि इससे देशों के बीच तनाव खत्म हो जाएंगे, शायद अतिरंजना होगी। पर यह भी सच है कि जब हजारों दर्शक एक साथ खुशी मनाते हैं, या निराशा साझा करते हैं, तब वे केवल नागरिक नहीं रहते, बल्कि साझा अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यही वह मानवीय जुड़ाव है, जिसकी आज दुनिया को सबसे अधिक जरूरत है। ऐसे में फुटबाल के महाकुंभ के सामने चुनौती सिर्फ सफल आयोजन की नहीं, बल्कि अपनी मूल भावना को जीवित रखने की भी है।