हमारे देश में भी नया साल जनवरी में ही आता है। एक बार फिर हैप्पी न्यू ईयर की हुंकार होगी। शेम टू यू का शिष्टाचार, दारू(ण) वातावरण, दंगल-मय पर्यावरण, चहक उठेगी धरा। फूलों की चाह बुके में गुंथकर ड्राइंगरूम में शोभित होने को होगी। माली भी बिजनेस करेंगे।
खानदानी हकीमों के इलाज सरीखी नए साल के स्वागत की भी तीन किस्में हैं। पहली किस्म वाले लिहाफ में दुबककर टीवी के सामने रात बारह बजने के इंतजार में चैनल पर परोसे जाने वाले सारे मसाले ठूंस लेते हैं। पैसे फूंकने की सुविधा न होने की वजह से घरेलू तरीके से नए साल का स्वागत करना उनकी मजबूरी होती है। नंबर दो पर आते हैं विशेष नर-नारी, जिनकी धारणा है कि नया साल बरस्ते महंगे होटलों की मेज से आएगा। हैसियत पर बट्टा न लगे, इस कारण वे महीने भर के राशन-पानी की कॉस्ट पर इकतीस दिसंबर को डिनरोपरांत डगमगाते लड़खड़ाते कदमों से वेलकम करते हैं नए साल का। अनलिमिटेड पैसा फूंकने वाले लिमिटेड लोगों का तीसरा तरीका शाही है। यह समुदाय जानता है कि नया साल टीवी के आगे बैठने और होटल की डाइनिंग टेबल या डांसिंग फ्लोर पर नहीं आता। नया साल सिर्फ गोवा या अन्य किसी टापू की साइड से ही एंट्री लेता है।
नए साल पर जितना सीना तानकर अखबारों में राशिफल आते हैं, उतना और कोई नहीं। जीवन में हलचल और उतार-चढ़ाव बना रहेगा, शुरू के तीन महीने कष्टप्रद, पड़ोस से सचेत रहें, मीन को पानी से भय, मिथुन राशि के जातकों में पति-पत्नियों में तनाव वगैरह पढ़-पढ़कर भला कौन नया साल मनाएगा? ज्योतिष से बचो, तो यांत्रिक शुभकामनाओं का ठेला होता है। मौलिकता के अभाव में उधार शुभकामनाओं की ठेलम-ठेल है। यह सब न भी किया जाए, तब भी आता है नया साल। बाप-दादाओं के जमाने में जब पैसा फूंकने की सुविधा नहीं थी, तब भी आता ही था। बहरहाल बंदा भी उधार ले रहा है सुधांशु उपाध्याय की पंक्तियां- नए साल में इतना तो हो थोड़ी दाल मिले/ कोई मछली नहीं चाहती, उसको जाल मिले।