भीगे हुए गेहूं और चावल के अनगिनत बोरों के खुले मैदान में सड़ते हुए दृश्यों को जब हम टेलीविजन चैनलों पर लगातार देखते हैं, तो देश के गरीबों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को लेकर यूपीए सरकार के दृष्टिकोण की गंभीरता पर भरोसा करना कठिन हो जाता है।
साल दर साल, एक ही कहानी दोहराई जाती है कि भंडारण क्षमता की कमी है और बड़े पैमाने पर अनाज की बरबादी हो रही है। फिर भी जमीनी हकीकत में शायद ही रत्ती भर बदलाव आया हो।
वक्त की नजाकत को भांपते हुए और अगले आम चुनावों के दौरान खेल बदलने वाले हथियार के रूप में एक संभावना तलाशते हुए कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश, 2013 पर देश में विस्फोटक बहस छिड़ी हुई है, जो हैरान नहीं करती।
इस मुद्दे पर ढेरों बातें की जा रही हैं, लेकिन इस अध्यादेश का समर्थन और मुखालफत करने वाले दोनों पक्ष एक बिंदु पर अभी अस्पष्ट हैं।
इसकी मुखालफत करने वाले ज्यादातर लोगों का तर्क इसे लागू करने की प्रक्रिया के इर्द-गिर्द है। उन्हें आशंका है कि इसके वित्तीय प्रभाव के चलते इसे क्रियान्वित करने में दिक्कत आ सकती है।
इसके अलावा कुछ लोगों का वैचारिक विरोध है, जो सरकारी धन से कल्याणकारी उपायों या हक के सिद्धांत के खिलाफ हैं, जिसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा इत्यादि जैसे विशेष लाभ मुहैया कराए जाने की कानूनी गारंटी दी जाती है।
क्या विभिन्न राजनीतिक दल इस कानून को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे? इन स्थितियों को देखते हुए खाद्य सुरक्षा के बारे में मौजूदा बहस इस पर टिकी है कि किस तरह से यह कानून गरीबों की बेहतर तरीके से मदद कर सकता है।
इसके आलोचक मौजूदा जन वितरण प्रणाली (पीडीएस), जो प्रस्तावित कानून को लागू करने के मामले में मुख्य साधन है, में भारी रिसाव और व्यापक भ्रष्टाचार की बात करते हैं।
जब वे व्यापक स्तर पर यह बात रखते हैं कि कल्याणकारी कार्यक्रमों में व्यापक भ्रष्टाचार के कारण गरीबों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो उनका एक ठोस तर्क होता है।
जब वे इस कार्यक्रम को लागू करने की लागत और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव की बात करते हैं, तो वे ज्यादातर मध्यम वर्ग की सहज सोच को परिलक्षित करते हैं।
लेकिन अध्यादेश के कुछ आलोचक जब सभी कल्याणकारी कार्यक्रमों के खिलाफ तर्क देते हैं और कहते हैं कि सरकार अपनी इन नीतियों से अर्थव्यवस्था को नष्ट कर देगी या फिर देश की विकास की संभावनाओं को पलीता लगा देगी, तब वे अपनी बात को लेकर कुछ ज्यादा ही फिसलन की स्थिति में होते हैं।
देश की अर्थव्यवस्था में सरकार के हस्तक्षेप की सीमा को लेकर लंबे समय से बहस चली आ रही है और इस बहस से बहुत जल्द कुछ हल निकलने की संभावना भी नहीं है।
पर, जैसा कि वाशिंगटन डीसी के एक एनजीओ द सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस की अक्टूबर, 2009 की रिपोर्ट में कहा गया है, हालिया वित्तीय व आर्थिक संकट के साथ ही बढ़ती गैरबराबरी और दुनिया के अनेक हिस्सों की आर्थिक जड़ता से इस मान्यता को बल मिला है कि आर्थिक विकास में सरकार की भूमिका होनी चाहिए तथा सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाना चाहिए।
इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका लाभ समाज के हर तबके तक पहुंचे ताकि उनका जीवन स्तर ऊंचा उठ सके।
शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन, साफ पानी और सफाई व्यवस्था पर सरकारी खर्च कोई धर्मार्थ कार्य नहीं है, बल्कि गरीबों और वंचितों को सक्षम बनाने की दिशा में एक पहल है, जिससे विकास की कहानी को बेहतर बनाया जा सके।
प्रोफेसर अमर्त्य सेन और प्रोफेसर ज्यां द्रेज ने अपनी नई किताब, 'एन अनसर्टेन ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कॉन्ट्रिडिक्शंस' में लिखा है कि वास्तव में एशियाई अनुभव, मानव उन्नति और आर्थिक विस्तार के एक कुशल इस्तेमाल पर आधारित है, जो 19 शताब्दी के आखिर में जापान से शुरू होकर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और धीरे-धीरे चीन तक पहुंचा। इसमें स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर पोषण और अन्य कारक शामिल हैं, जिन्होंने मानव क्षमता को बढ़ाया।
भारत में भी ऐसे कई राज्य हैं जिन्होंने महसूस किया है कि गरीबों की क्षमता में वृद्धि के लिए उठाए गए कदमों को खैरात की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। यह उन्हें बाजार के लिए तैयार करने के साथ-साथ उन्हें अर्थव्यवस्था का उत्पादक सदस्य बनाता है।
उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में खाद्य सुरक्षा प्रणाली पहले से ही लागू है।
ऐसी कई बातें हैं, जो एक देश में व्यापक स्तर की विकास कहानी का आधार बनती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, साफ पानी, सफाई व्यवस्था उतनी ही आवश्यक हैं जितनी सड़कें और सिंचाई। इसलिए किसी एक पक्ष को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
सार्वजनिक संसाधन हर देश की सफलता में एक अहम भूमिका निभाता है। लेकिन यह बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।
जब तक हमारे यहां कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और रिसाव को कम करने के तरीके नहीं खोजे जाते, वास्तविक लक्ष्य नहीं हासिल किए जा सकेंगे। यह बात सभी कार्यक्रमों के लिए लागू होती है, चाहे वह खाद्य सुरक्षा दिलाने का मामला हो या फिर स्कूल, सड़क या अस्पताल बनाने का।