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हिंसा का पता बनतीं वेबसाइटें

Thu, 01 Oct 2015 08:07 PM IST
क्षमा शर्मा
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देश में इन दिनों डिजिटल और ऑनलाइन दुनिया के जरिये शासन करने की प्रणाली पर काफी जोर दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस तरह से हम आसानी से दुनिया से जुड़ जाएंगे। हमारा व्यापार और कामकाज आसान हो जाएगा। ऑनलाइन दुनिया की सहूलियतें बेशुमार हैं, तो खतरे भी कम नहीं हैं। वहां बम बनाने से लेकर हर तरह के अपराध करने और सिखाने के तरीके मौजूद हैं।
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कुछ दिन पहले बंगलूरू की एक लड़की ने आत्महत्या करने के तरीकों की ऑनलाइन खोज करने के बाद अपना जीवन खत्म कर लिया था। इसी तरह न्यूयॉर्क में एक लड़की ने ऑनलाइन ऑर्डर कर सायनाइड मंगाया, फिर उसे खाकर अपनी जान दे दी। अब उसकी मां ने ऑनलाइन सामान बेचने वाली कंपनी पर मुकदमा कर दिया है। मुकदमे का फैसला क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, पर इस तरह के सामान का बेचा जाना बेहद चिंताजनक है। आखिर पुरानी किस्म की दुकानों पर तो सायनाइड नहीं मिल सकता। वह न बेचा जा सके, इसके लिए दंडात्मक प्रावधान भी जरूर होंगे। मगर क्या ऑनलाइन बेचा जा सकता है और क्या नहीं, इस तरह के कानून अभी बनाए ही नहीं गए हैं।

बहुत साल पहले एक किताब बेस्टसेलर बनी थी। वह आत्महत्या करने के आसान तरीके बताती थी। उसकी काफी आलोचना भी हुई थी। मगर सिर्फ आलोचना होती रहे और किसी को कोई फर्क न पड़े, तो इससे क्या फायदा? जिस लड़की ने आत्महत्या के तरीकों के बारे में ऑनलाइन जानकरी लेकर जान दी, और जिसने ऑनलाइन सायनाइड मंगवाया, वे जीवित तो नहीं हो सकतीं। उनकी जान लेने की जिम्मेदारी किसकी मानी जाएगी?
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संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि दुनिया भर में तिहत्तर प्रतिशत औरतें ऑनलाइन हिंसा का शिकार हैं। इसमें पीछा करना, गाली-गलौज करना, अश्लील सामग्री पोस्ट करना आदि शामिल हैं। इसी रिपोर्ट में बढ़ती चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर भी गहरी चिंता प्रकट की गई है। इस सम्मेलन में सत्तरह लक्ष्यों पर दुनिया भर के 193  देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। शांति, न्याय और समानता तो तभी मिल सकती है, जब किसी के प्रति अपराध न हो। लेकिन हम देखते हैं कि जब भी कोई नई तकनीक आती है, वह अपना पहला शिकार औरतों को बनाती है। जैसे कि इन दिनों ऑनलाइन दुनिया में हो रहा है।

सोचा तो यह जाता रहा है कि बढ़ती तकनीक हर किस्म की असमानता दूर कर लोगों को बराबरी देती है। पर अगर इससे महिलाओं के प्रति अपराध करने के तरीके सिखाए जाने लगें, उनके प्रति हिंसा बढ़ने लगे, तो यह सोचना होगा कि आखिर तकनीक का किस हद तक इस्तेमाल हो। अश्लील फिल्म बनाना, उसे यू-ट्यूब पर डालना, अश्लील मैसेज भेजना, एमएमएस बनाना इसी तकनीक के जरिये तो लोग सीख रहे हैं। इसके जरिये ब्लैकमेलिंग के भी बहुत से हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आज लड़कियां काम-काज के सिलसिले में जगह-जगह जाती हैं। वे नहीं जानतीं कि कहां वेवकैम या स्पाई कैमरे उनका पीछा कर रहे हैं। ये फिल्में वायरल हो जाती हैं। लड़कियों को भयानक मुसीबतों से गुजरना पड़ता है। इसे भी आज के दौर में हिंसा माना जा सकता है। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि किस तरह ऑनलाइन दुनिया के अपराधों को रोका जाए, किसी को तंग न किया जा सके और लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी भी बनी रहे।
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