मानसून सत्र में लगातार हो रहा हंगामा चिंताजनक है। वरिष्ठ सांसद और लोकसभा में माकपा संसदीय दल के नेता वासुदेव आचार्य इसके लिए सरकार को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। इस पूरे मसले पर उनसे हरीश लखेड़ा ने बातचीत की -
मानसून सत्र शुरू होने के बाद से ही संसद में लगातार हंगामा हो रहा है। खासतौर पर लोकसभा तो एक दिन भी नहीं चल पाई है। इस हंगामे के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं।
संसद के हंगामे के लिए कोई एक जिम्मेदार है, तो वह है यूपीए सरकार। क्योंकि सरकार ने मानसून सत्र शुरू होने के मात्र तीन दिन पहले तेलंगाना राज्य के गठन का ऐलान किया। पिछले अनुभव से सरकार को पता था कि तेलंगाना मामले से सदन पर भी असर पड़ेगा। अब सत्र शुरू हुए तीन हफ्ते हो चुके हैं, लेकिन लोकसभा में तो कोई ठोस कामकाज और किसी मुद्दे पर गंभीर चर्चा भी नहीं हो पाई है। सरकार को पिछले बजट सत्र के बाद ही यह फैसला कर लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया। यदि दो महीने पहले यह घोषणा हो जाती, तो अब संसद में बाधा नहीं आती। सरकार ने जान-बूझकर ऐसा किया।
भाजपा 2 जी और कोलगेट का उदाहरण देकर कहती है कि सरकार विपक्ष की हर मांग को देर से मानती है, इसलिए सरकार की वजह से ही संसद में हंगामा होता है।
वास्तव में भाजपा भी नहीं चाहती है कि संसद चले। भाजपा के नेता संसद के बाहर तो कहते रहते हैं कि वे खाद्य सुरक्षा विधेयक का समर्थन करेंगे, लेकिन वे नहीं चाहते कि यह विधेयक पारित हो। इसलिए सत्र को चलाने में भाजपा की भी कोई दिलचस्पी नहीं हैं।
संसद के दो सत्र 2 जी और कोलगेट कांड की भेंट चढ़ चुके हैं। इस सत्र में तीन हफ्तों से लोकसभा में हंगामा जारी है। ऐसा कब तक चलेगा?
2 जी मामला 2011 में संसद के शीतकालीन सत्र में आया था। तब हम इस कांड की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति चाहते थे, पर सरकार नहीं मानी। सरकार यदि समय पर विपक्ष की मांग मान लेती, तो सत्र हंगामे की भेंट नहीं चढ़ता। बाद में सरकार ने वही मांग 2012 के बजट सत्र में मान ली। कोलगेट कांड में भी सरकार ने बहुत बाद में विपक्ष की मांग मानी।
क्या हर मांग का रास्ता हंगामा ही है?
हम तो चाहते हैं कि संसद चले। यदि संसद में बहस और चर्चा न हो, तो फिर इसकी जरूरत ही क्या है? देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है, रुपया दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं, आर्थिक संकट बढ़ रहा है, देश में निराशा का वातावरण पैदा हो गया है। लेकिन मानसून सत्र में अब तक हम एक भी मुद्दे पर सदन में चर्चा नहीं कर पाए हैं।
यह मांग भी उठती है कि यदि संसद में कामकाज नहीं होता है, तो सांसदों को उस दिन का वेतन और भत्ता नहीं मिलना चाहिए।
हम शुरू से कहते रहे हैं कि ‘नो वर्क, नो पे’। लेफ्ट यही मांग करता रहा है, पर दूसरे दल ऐसा नहीं चाहते।
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में साल भर में संसद की डेढ़ सौ तक बैठकें होती थीं, लेकिन अब मात्र 50-55 बैठकें ही हो रही हैं, उनमें भी ज्यादातर दिन हंगामा हो जाता है।
हमारी मांग रही है कि संविधान संशोधन करके साल भर में कम से कम सौ बैठकें जरूरी कर दी जाएं। यह संसदीय फोरम की सिफारिश भी है। बैठकें लगातार जिस तरह घट रही हैं, वह चिंता का विषय है।
इस हंगामे का आखिरकार समाधान क्या है?
संसद का कामकाज सुचारु तौर पर चलाने के लिए सरकार को पहल करनी होगी। फिर मुख्य विरोधी दल भाजपा की भी जवाबदेही बनती है, लेकिन दोनों ही नहीं चाहते कि संसद चले।