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कदम मिलाकर चलना होगा: भारत को एक मंच पर एकजुट करना तभी संभव है, जब लोगों में आपसी सद्भाव और एकता हो

शंकर कुमार सान्याल
Updated Sat, 15 Aug 2026 11:10 AM IST

सार

महात्मा गांधी का दृढ़ विश्वास था कि भारत को एक मंच पर एकजुट करना तभी संभव है, जब लोगों में आपसी सद्भाव और एकता हो। समय की मांग प्रगतिशील जीवन-शैली को अपनाकर युगानुरूप उन्नति के साथ कदम मिलाकर चलना है।
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स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार वंदे मातरम गान। - फोटो : पीटीआई


गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत का जन्म अलग-अलग धर्मों की जटिल, विरोधाभासी और संकीर्ण व्याख्याओं और उनके पालन के तरीकों से हुआ था, जबकि असल में सभी धर्म दुनिया की, पूरी मानवता की शांति, खुशी और सद्भाव से जुड़े हैं। उनका विश्वास था कि भारत को एक मंच पर एकजुट करना तभी संभव है, जब लोगों में आपसी सद्भाव व एकता हो; और यही एकता भारत में औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन से आजादी की लड़ाई को व्यवस्थित, प्रभावी तथा निर्णायक ढंग से आगे बढ़ा पाएगी। यह एकजुट सोच से ही संभव होगा, न कि हिंसक टकराव से, क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की असली ताकत सहनशीलता और अहिंसा से ही बनी रहेगी। भारतीय सभ्यता की ताकत का यही शाश्वत स्रोत है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने भी माना था-ठीक उसी समय, जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में अपनी मुहिम शुरू करने वाले थे, जो आजीविका की मजबूरी में काम कर रहे गरीब भारतीय मजदूरों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ थी।


भारतीय जाति के बहुत पुराने इतिहास से उपजी अपनी अंतरात्मा की आवाज से प्रेरित होकर, गांधीजी ने अहिंसा के आदर्शों और सिद्धांतों को भारतीय सभ्यता के विकास की परंपरा के रूप में अपनाया। ये सिद्धांत एक ऐसी आधुनिक सोच को जन्म देंगे, जो आध्यात्मिकता के शाश्वत मानवीय लक्ष्य पर आधारित होगी और सभी धर्मों के बीच सामंजस्य बिठाएगी। पूरी मानवजाति एक ही खून से जुड़ी है, एक ही हवा में सांस लेती है और एक ही आसमान के नीचे रहती है; ये सभी सामंजस्यपूर्ण शक्तियां सर्वशक्तिमान रचयिता की कृपा से मानवता को उस आध्यात्मिक साम्राज्य में प्रवेश करने के लिए सौंपी गई हैं, जिसे इन्सान ‘स्वर्ग’ के रूप में जानते हैं और जो धरती माता की पवित्र गोद में छिपा हुआ था। रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी कहा था कि सच्चा धर्म ‘मानव-धर्म’ है, जिसे जीवन-मूल्यों की संज्ञा दी जा सकती है। हमें उन पुरातन आदतों और प्रथाओं से ऊपर उठना चाहिए, जो चरमपंथी नेताओं द्वारा समाज पर थोपी जा रही हैं और जो केवल रूढ़िवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती हैं, जबकि समय की मांग प्रगतिशील जीवन-शैली को अपनाकर युगानुरूप उन्नति के साथ कदम मिलाकर चलना है।

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