साधो, किसी के कूचे से बेआबरू होकर निकलने का मजा ही कुछ और है। यह सबको नसीब नहीं होता। जो इस स्थिति को प्राप्त होते हैं, वे बड़े भाग्यवान होते हैं। कोई पूछे कि गए ही क्यों उस राह पर, तो कहेंगे कि हमें 'स्वराज संवाद’ का चस्का लगा था। इश्क का रंग ही ऐसा है कि उसके चढ़ने पर कुछ और दिखाई नहीं देता। लड़की के बाप की बनाई 'अनुशासन समिति’ दो मिनट में बाहर का रास्ता दिखा देती है। कूचा वही और हम भी वही, लेकिन नजारा बदला हुआ। वे भीतर और हम बाहर। अब दरवाजे के अंदर प्रविष्ट हों, तो कैसे?
यह इश्क में भावुक होने का जमाना नहीं है। वे दिन और थे, जब मजनूं की पीठ पर पड़े कोड़े के निशान लैला के शरीर पर देखे जा सकते थे। हर बाप के भीतर एक अदद स्टालिन बैठा होता है। उसके कूचे, उसी की चलेगी। पिटा हुआ प्रेमी अब पहले की तरह कुर्बानी का रास्ता अख्तियार नहीं करता। वह नहा-धोकर नए कूचे की तरफ चल पड़ता है और तिनका-तिनका जोड़ नया आशियाना बना लेता है। मार्गदर्शक से दर्शक में तब्दील होने वाले पीएम इन वेटिंग दूसरा घर बनाने का हौसला नहीं जुटा पाए, सो उनका हाथ कौन थामे!
योगेंद्र यादव हारे हुए मोहब्बती हैं। कविता और शायरी यहीं से जन्म लेती है। इन दिनों उनकी बातों में वियोग रस की भरमार है। अब वह राजनेता कम, कवि और कलाकार ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। वैसे राजनीति में भी चोट खाए हुओं का एक पृथक दल बनाया जा सकता है। 'दुनिया के घायलों एक हो’ का नारा इन दिनों बहुत मौजूं रहेगा। गोविंदाचार्य, आडवाणी और संजय जोशी के सीने में भी ऐसे ही जख्म हैं। एक जैसे घाव, एक तरह के दर्द। ढूंढने चलो, तो हजार मिलेंगे। अरविंद केजरीवाल ने अब आम आदमी की टोपी उतार दी है। झाडू को एक किनारे रखकर वह सत्ता की गंगोत्री नहाकर पवित्र हो चुके हैं। नारों की केंचुल उतारकर एक तरफ फेंक दी है। पद की भी तो कुछ गरिमा है। भ्रष्टाचार मिटाने की जल्दी क्या है? अभी से ऐसा करेंगे, तो पांच साल में भ्रष्टाचार फिर पैदा हो जाएगा।