वर्ष 1932 में संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी ने झूसी (प्रयाग) में अखंड नाम जप संकीर्तन का आयोजन किया था। संत-महात्माओं, विशेषकर आनंदमयी मां की इच्छा थी कि महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी महाराज संकीर्तन अनुष्ठान के अंतिम दिन स्वयं उपस्थित होकर प्रवचन करें। ब्रह्मचारी जी ने पंडित रामकृष्ण को महामना को आमंत्रित करने के लिए काशी भेजा।
महामना के पास बड़ौदा राज्य के दीवान बैठे हुए थे। महाराज बड़ौदा ने दीवान को मालवीय जी से एक कार्यक्रम में उपस्थित रहने की स्वीकृति लेने के लिए काशी भेजा था। जब मालवीय जी को पता लगा कि ब्रह्मचारी जी ने भगवन्नाम संकीर्तन अनुष्ठान में उपस्थित रहने की प्रार्थना की है, तो वह दीवान से नम्रता के साथ बोले, अच्छा हुआ कि दोनों कार्यक्रमों के आमंत्रण एक साथ मिले।
वह कुछ क्षण आंखें बंद कर कुछ सोचते रहे, फिर बोले, राजमहल के कार्यक्रम की अपेक्षा संकीर्तन यज्ञ में जाना मेरा पहला कर्तव्य है। वहां जाने पर संत-महात्माओं के दर्शन से नेत्र पवित्र होंगे और भगवन्नाम संकीर्तन से कान। और मालवीय जी ने तुरंत अनुष्ठान में शामिल होने की स्वीकृति दे दी।
जब महामना ने काशी से प्रयाग पहुंचकर यज्ञ में आहुतियां दीं तथा संकीर्तन के महत्व पर प्रभावशाली प्रवचन दिया, तो बड़े-बड़े धर्माचार्य और संत-महात्मा मंत्र-मुग्ध होकर तन की सुध-बुध खो बैठे।