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हम भी जुबान रखते हैं

Mon, 15 Dec 2014 07:29 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, मैं सड़क पर फिसला और उनकी जुबान फिसल गई। वैसे दोनों घटनाओं में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। सड़क पर जब हम फिसलते हैं, तो जरूरी नहीं कि उसके लिए स्वयं जिम्मेदार हों। जुबान पर भी कई बार हमारा बस नहीं होता और वह मुद्दे-बेमुद्दे फिसलन की शिकार हो ही जाती है। फिसल जाने के बाद ही हमें एहसास होता है कि अरे, हम तो फिसल गए। साध्वी मंत्री की जुबान फिसलना कोई रासायनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन्होंने सिर्फ यही साबित किया है कि वह भी जुबान रखती हैं।
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मेरे पिता अपने किसी मित्र को मेरा परिचय कराते, तो मुझे 'साहबजादे’ कहते थे, और नाराज हो जाने पर 'हरामजादे’। यह उनका नपा-तुला जुमला होता था, जिसे सुनने के हम आदी हो चुके थे। हमें उनके कहे की न खुशी होती थी, न ही रंज। यह देश भूल गया कि पिता और साध्वियों के कहे का बुरा नहीं मानना चाहिए। जुबानें साध्वी से पहले भी फिसलती रही हैं और आगे भी फिसलती रहेंगी। आज जो साध्वी की जुबान के फिसलने का विरोध कर रहे हैं, उनकी जुबानें भी मौके-बेमौके फिसलती रही हैं।

जुबान फिसलती है, तो उसके फिसलने की आवाज दूर और देर तक गूंजती रहती है। हम जुबान से निकले लफ्जों को पकड़ कर लटक जाते हैं और कुछ भी समझना बंद कर देते हैं। सब अपनी-अपनी तरह जुबान से निकले शब्दों का विश्लेषण करते हैं। कोई 'हाय राम’, तो कोई 'हे राम’ कहकर जुबान को धिक्कारता है। आखिर जो फिसले न, वह जुबान ही क्या।
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आप जानते हैं कि जानवर कभी बदजुबान नहीं होते। यह हक इस धरती पर सिर्फ मनुष्य जाति को ही हासिल है। पर हमारे एक मित्र का कहना है कि पशु-पक्षी भी आदमी की तरह गंदी जुबान बोलते हैं। फर्क यह है कि हम उनकी बोली-बानी का अनुवाद नहीं कर पाते। वैसे ईश्वर ने हमें जुबान दी है, लेकिन यह बंदिश तो नहीं लगाई कि हम कभी बदजुबान न हों। रोज-रोज मीठा बोलने से मुंह का स्वाद जाता रहता है। कभी-कभार बदजुबान होने से जायका बदलता है।
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