परिवर्तन जब सुनामी की लहरों जैसा हो, तो परिणाम भी लोगों को कुछ वैसे ही धारदार अपेक्षित होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपेक्षा है कि वह पुतिन और देंग के फौलादी फन तथा समृद्धि लाने वाली नीतियों से आगे बढ़ेंगे। पहला कदम विदेश नीति के सन्नाटे को तोड़ पड़ोसी देशों की आकाश गंगा से शपथ ग्रहण को रोशन करने वाला रहा। दक्षेस देशों की अर्थव्यवस्था युद्धहीन शांति की स्थिति में आसियान तथा ब्रिक्स की अर्थव्यवस्थाओं का मुकाबला कर सकती है, लेकिन उन्हें सशक्त नेतृत्व चाहिए। फिर पहली यात्रा के लिए भूटान को चुनकर मोदी ने बड़े-बड़े विदेश नीति पंडितों को चौंका दिया। सरकार बनते ही तुरंत काले धन की पहचान और वापसी के लिए विशेष जांच दल बिठाकर मोदी सरकार ने वह काम किया, जो पिछले 67 वर्षों में नहीं हो पाया था।
सबसे बड़ा सवाल देश में समृद्धि और अर्थव्यवस्था में मजबूती लाना है। उसके लिए भारत के निर्माण क्षेत्र को व्यापक आधार देना होगा। अमेरिका से रक्षा उत्पादन में समझौते की आशा है और भारत का रक्षा उत्पादन क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए इस आधार पर खोला जा रहा है कि प्रौद्योगिकी का शत-प्रतिशत स्थानांतरण होगा। कीमतों पर नियंत्रण और आम जरूरत की वस्तुओं को सुगमता से उपलब्ध कराने के साथ-साथ रुपये को डॉलर के मुकाबले मजबूत करने तथा किसानों के लिए बेहतर दिन सुनिश्चित करना बड़ी चुनौतियां हैं। रेट्रोस्पेक्टिव कर यानी पिछले समय से लागू होने वाले मूर्खतापूर्ण तथा अर्थव्यवस्था विनाशक कदम को वापस लेने और जीएसटी का वायदा पूरा करने के आश्वासन से व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्र में नया उत्साह आया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैस तथा डीजल के दामों में भी कठोरतापू्र्वक मूल्य नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। रेल भाड़े में वृद्धि द्वारा मोदी सरकार ने कठोरतापूर्वक आने वाले अच्छे दिनों का बिगुल बजाया, क्योंकि चरमराती और दिवालिया हो रही रेल व्यवस्था में जब तक आवश्यक निवेश नहीं होगा, तब तक साधारण यात्री को न ही सुविधा मिलेगी और न ही आवश्यक मार्गों पर गाड़ियां चलाई जा सकेंगी। लेकिन इसके लिए पूंजी निवेश को कैसे बढ़ाया जाए? ईंधन, खाद्य-पदार्थों पर सब्सिडी को कम करने की मांग है, लेकिन इसे बहुत संवेदनशील तरीके से देखना होगा। दूसरा संवेदनशील मुद्दा श्रम कानूनों में बदलाव का है। श्रमिकों के हित के साथ तनिक भी समझौता किए बिना अधिक और बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ब्रिटिश तथा नेहरू युग के समाजवादी कानूनों में परिवर्तन आवश्यक है।
मोदी सरकार के तीस दिनों का बड़ा चित्र आत्मविश्वास तो पैदा करता ही है, साथ ही यह भी सिद्ध करता है कि विराट आशाओं को पूरा करने का मार्ग खड्ग की धार पर चलने के समान है। लेकिन यह किसने कहा और किसने सोचा कि भारत को उसकी नियति के स्तर तक पहुंचाने का काम कंटकाकीर्ण नहीं होगा? संघ की प्रार्थना में भारत के परम वैभव के लिए कंटकाकीर्ण मार्ग से गुजरने की बात हम हर दिन दोहराते ही हैं।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)