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चीन का शांतिप्रिय योद्धा

Fri, 13 Dec 2013 07:58 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
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चीन की साइबर दुनिया 2010 में एक दिलचस्प घटना का गवाह बनी। तब इंटरनेट पर 'एंप्टी चेयर' (खाली कुर्सी) या 'चेयर' से संबंधित कोई मुहावरा या शब्द सर्च किया जाता था, तो संबंधित वेबसाइट ब्लॉक (प्रतिबंधित) होती थी। इसकी वजह थी, उस वर्ष नोबल पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित करने के लिए हुए कार्यक्रम के दौरान एक कुर्सी का रिक्त होना!
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यह कुर्सी खाली ही रही, क्योंकि यह शांति के नोबल विजेता लियू जियाओबो के लिए रखी गई थी, क्योंकि वह बतौर राजनीतिक कैदी काल-कोठरी में बंद थे। मानवाधिकारवादियों को उम्मीद थी कि उनका 'शांतिप्रिय योद्धा' कम से कम उस दिन तो उनके बीच होगा; इसके लिए 140 नोबल पुरस्कार विजेताओं ने चीन सरकार को अर्जी भी दी थी, लेकिन वह 'राज्य के खिलाफ बगावत करने वाले विद्रोही' थे, इसलिए बीजिंग ने उन्हें सम्मान समारोह में शामिल होने की अनुमति नहीं दी। मानवाधिकारों के हिमायती आज भी अपने 'डार्क हॉर्स' (लोकतंत्र के पक्ष में आवाज बुलंद करने की वजह से लियू को मिला उपनाम) की रिहाई के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन लियू के लिए हालात पहले जैसे ही हैं।

आखिर लियू को लेकर चीन सरकार इतनी 'कट्टर' क्यों है? एकदलीय शासन-व्यवस्था की मुखालफत करती लियू की रचनाएं चीन सरकार के लिए किसी 'अराजतंत्रिक दस्तावेज' से कम नहीं। फिर चाहे क्रिटिक ऑन च्वाइसेज (चीन की शिक्षा नीति की आलोचना) हो या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग करती एस्थेटिक ऐंड ह्यूमेन फ्रीडम।
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मानवाधिकार, लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक उदारीकरण आदि की वकालत करता घोषणापत्र चार्टर-8 इस कड़ी की आखिर कील साबित हुआ। 10 दिसंबर, 2008 को चार्टर-8 के सार्वजनिक होने से दो दिन पहले ही लियू हिरासत में ले लिए गए और ग्यारह वर्षों के लिए जेल भेज दिए गए।

हालांकि लियू के निशाने पर मात्र शासन व्यवस्था ही नहीं, वे लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन भी रहे हैं, जिसे इतिहास बनते थ्यानमान चौक ने देखा है। और इसीलिए उन्होंने कुछ आलोचक भी कमाए। विवाद उनके उस बयान पर भी हुए, जिसमें उन्होंने चीन को 'सभ्य' होने में 300 साल का और वक्त लगने की बात कही थी। लेकिन लियू के करीबी जानते हैं कि वह बेवजह टिप्पणी नहीं करते। आखिर अमेरिका में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर लोकतंत्र की लड़ाई कोई 'जुनूनी' ही लड़ सकता है!
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- हेमेन्द्र मिश्र
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