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चेतावनी : ये आपदाएं क्या कह रही हैं, 'सुस्त रफ्तार' में सचेत होने की जरूरत

अनिल प्रकाश जोशी
Updated Tue, 26 Aug 2025 01:21 AM IST

सार

हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप मिलकर इस क्षेत्र को आपदाओं की प्रयोगशाला में बदल रहे हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी राज्यों की स्थिति और भी भयावह हो सकती है।
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धराली - फोटो : पीटीआई


हिमालय में त्राहि-त्राहि की स्थिति अब सिर पर चढ़कर बोलने लगी है। यह सच है कि केवल अतिवृष्टि ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं है, बल्कि हिमालयी प्रकृति में आए बदलाव भी इसका बड़ा कारण हैं। यही बदलाव आज गंभीर संकट का रूप ले चुके हैं।


कश्मीर भी इस आपदा से अछूता नहीं है, जहां पिछले 7–10 वर्षों में बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 2020 में सात, वर्ष 2021 में 11, वर्ष 2022 में 14, वर्ष 2023 में 16 और वर्ष 2024 में अब तक 15 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। इसके अलावा कई छोटी-बड़ी घटनाओं ने भी स्थानीय जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।


इसी तरह हिमाचल प्रदेश में हर साल लगभग 5–6 बार बादल फटने की घटनाएं होती हैं, जो भारी नुकसान पहुंचाती हैं। अब इनकी संख्या बढ़कर सालाना 15–20 तक पहुंच गई है। केवल उत्तराखंड की बात करें, तो पिछले एक दशक में 67 बड़ी और व्यापक तबाही वाली घटनाएं घट चुकी हैं।


इन आंकड़ों और हालिया घटनाओं से यह स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। बादल फटने की घटनाएं न केवल पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत करती हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप मिलकर इस क्षेत्र को आपदाओं की प्रयोगशाला में बदल रहे हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी राज्यों की स्थिति और भी भयावह हो सकती है।


पिछले एक दशक में हिमालय में जो हो रहा है, वह गंभीर तो है ही, हम इसके कारणों को समझने में भी चूक रहे हैं या उसकी अनदेखी कर रहे हैं। ऐसी घटना केरल में भी हुई थी, जिसने सारे देश और दुनिया में सुर्खियां बटोरीं। पिछले वर्ष सिक्किम में भी ऐसी ही घटना हुई। बाढ़ या बादल फटने जैसी तबाही किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है, इसलिए अब इस पर विचार करने का वक्त आ गया है कि ऐसा क्यों हो रहा है और उसके नुकसान को हम कैसे कम कर सकते हैं।


जो सबसे महत्वपूर्ण बात हम समझने में विफल हो रहे हैं, वह यह है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ आशंका नहीं रह गया है, बल्कि वास्तविक रूप में उसका असर दिखने लगा है। यह केवल अपने ही देश में नहीं, बल्कि दुनिया भर में हो रहा है। चाहे वह चीन, अमेरिका, यूरोप के देश हों या थाईलैंड, इन सभी में इसी तरह की घटनाएं पिछले एक दशक से लगातार देखी जा रही हैं। तो शायद स्थान विशेष के कारण और घटना के अलावा जो ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा है, वह यह है कि ऐसा क्या कुछ हो रहा है, जो किसी भी समय और किसी भी मौसम में ढेर सारी बारिश से जनजीवन को तबाह कर दे रही है।
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यह सब कुछ अब ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की कृपा से हो रहा है, और यह प्रकृति का अपना तरीका है, अपने बदलाव को जताने का। जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने पिछले दो दशकों में इस तरह की कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। उनमें साफ-साफ इंगित था कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग आने वाले समय में सब कुछ बदल डालेगी, और यह सच भी हो रहा है।


इन घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है, जिसे हम समझना नहीं चाहते। हम कभी जंगल काटने को दोष देते हैं, कहीं विकास के प्रति अपना रोष प्रकट करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अब ऐसी तबाही के कारण कुछ भी नहीं टिक पाएगा, क्योंकि आप यह भी संज्ञान में लें कि जब भी इस तरह की बड़ी बाढ़ आती है, न जंगल बचते हैं और न ही मकान, और न ही हमारी बसावट। यही सब कुछ इन सभी घटनाओं के पीछे है।


इसका एकमात्र कारण यही है कि दुनिया की बदलती जीवन-शैली ने पृथ्वी को इस हद तक तपा दिया कि अब एक नया दौर हमारे बदलते मौसम का कारण है, जिसे हम क्लाउड बर्स्ट या अतिवृष्टि का नाम दे सकते हैं। और यह कहां, किस रूप में बरसेगा, यह इस पर निर्भर नहीं करेगा कि कहां विकास हुआ है और कहां नहीं। यह दोनों को बराबर ही दर्जे से देखेगी। यही समझ आज सबसे महत्वपूर्ण भी होनी चाहिए कि मनुष्यजनित इस प्राकृतिक व्यवहार का दोषी स्वयं मनुष्य है। प्रकृति के साथ मनुष्य ने जो छेड़छाड़ की है, वह उसी की प्रतिक्रिया दे रही है।


बदलती परिस्थितियों के प्रति हम कई तरह की विवेचना कर रहे हैं, उसके कारणों को देख रहे हैं। लेकिन जब तक हम इसकी गंभीरता को समझेंगे नहीं, हमारे पास कोई समाधान ही नहीं होगा। हिमालय इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, क्योंकि नमी वाली हवाएं ऊंचाइयों पर पहुंचकर जैसे ही निचला तापक्रम देखती हैं, वे बरस पड़ती हैं। आईपीसीसी ने भी यही कहा है।


इन्हीं बातों को लेकर अब एक और अंतरराष्ट्रीय संगठन का जन्म हुआ है, जिसको एजीई के नाम से जाना जाता है–अलायंस फॉर ग्लोबल एन्वॉयरन्मेंट। इसका मानना है कि अब इन परिस्थितियों में अगर हमको समाधान ढूंढने हैं, तो वे स्थानीय स्तर पर ही संभव होंगे। यह संगठन ऐसी ही समझ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है कि कैसे इन अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का हल स्थानीय स्तर पर जुटाया जाए। यह समझ जरूरी है कि आज जो कुछ भी हमारे चारों तरफ हो रहा है, वह मनुष्य जनित है, क्योंकि प्रकृति ने दंड देने की रफ्तार पकड़ ली है। अभी इसकी रफ्तार सुस्त ही है, जब तेज होगी, तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा।

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