संसद का मौजूदा सत्र व्यावहारिक रूप से पूरी तरह धुल गया। सांसद रोज नियमित रूप से इकट्ठा होते थे, लेकिन कुछ ही मिनटों बाद सदन स्थगित हो जाता था। सांसद अपनी सीट से उठकर खड़े हो जाते और मुद्दे उठाने लगते। संसद में कामकाज के गतिरोध के लिए पूरी तरह से विपक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इससे पहले राजग की समर्थक तेलुगू देशम पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए आश्वासन के संदर्भ में आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने से संबंधी मांग को लेकर सदन में तख्तियां लेकर जोरदार विरोध जारी रखा था, जबकि तेलुगू देशम पार्टी के मंत्री सरकार का हिस्सा थे। अंत में उन लोगों ने इस्तीफा दे दिया और राजग गठबंधन से बाहर आ गए। जब कावेरी पर शीर्ष न्यायालय ने फैसला सुनाया, तब सरकार समर्थक अन्नाद्रमुक ने वेल में पहुंचने का फैसला किया और शीर्ष अदालत द्वारा दी गई स्पष्ट सीमा अवधि के भीतर केंद्र द्वारा कावेरी प्रबंधन बोर्ड का गठन न किए जाने के खिलाफ विरोध किया। अन्य दलों ने भी अपने-अपने मुद्दे उठाए और सदन के कामकाज को बाधित किया।
इन सबके बीच कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियां सामने आई हैं। हंगामे के बीच लोकसभा ने बिना चर्चा के वित्त विधेयक को पारित कराने का फैसला किया। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जरा कल्पना कीजिए कि संसद द्वारा 22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के खर्च की अनुमति बिना इसकी पर्याप्तता और संरचना पर चर्चा किए दे दी गई। सभी विधेयकों में से यह वह विधेयक है, जो पूरी सरकार के कामकाज पर असर डालता है और आम तौर पर प्रमुख विभागों के राष्ट्रीय स्तर पर उभरने वाले मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जाती है। वित्त विधेयक पर चर्चा होती, तो रक्षा व्यय की पर्याप्तता पर सदस्यों के विचार जानने को मिलते, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों, खासकर गृह मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं पर सदस्यों द्वारा व्यापक चर्चा होती, लेकिन यह मौका गंवा दिया गया। किसानों के मुद्दे पर देश भर में चर्चा होती रही है और उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर व्यापक चिंता है। कई राज्यों को किसानों का कर्ज माफ करना पड़ा। सभी पार्टियां स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की कसमें खाती हैं, पर उसका अनुपालन बहुत कम हुआ है। ये सभी मुद्दे संसद के विचार के लिए आवश्यक थे। जब बहस शुरू हुई, तब अन्य दलों द्वारा उसमें बाधा पहुंचाई गई और यहां तक कि प्रधानमंत्री के भाषण को बाधित किया गया।
संसदीय परंपरा की मांग है कि जब अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो बाकी सभी कामकाज रोककर इस प्रस्ताव को प्राथमिकता के स्तर पर निपटाया जाता है। इसकी वजह है, कि अगर सदन को सरकार पर विश्वास नहीं है, तो ऐसी सरकार को बनाए रखना उचित नहीं होगा। पर इस अविश्वास प्रस्ताव को सदन में इस आधार पर स्वीकार नहीं किया गया कि सदन में व्यवधान की स्थिति थी। पर उसी सदन में सरकारी कामकाज होते रहे। मौजूदा स्थिति में इस अविश्वास प्रस्ताव में बहुत दम नहीं था, क्योंकि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है। इसके बावजूद अविश्वास प्रस्ताव को पेश न करने देने से जो मिसाल बनेगी, वह चिंताजनक है। उतनी ही चिंताजनक बात यह है कि अन्नाद्रमुक के सदस्यों को सदन में बाधा पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, ताकि अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार न किया जा सके। कुछ वर्ष पहले एक राजनीतिक दल के एक वरिष्ठ नेता ने बहुत ही खतरनाक धारणा सामने रखी थी कि जब संसद का इस्तेमाल मुद्दों को अनदेखा करने के लिए किया जाता है, तब संसद को बाधित करना लोकतंत्र के पक्ष में है और संसद में व्यवधान अलोकतांत्रिक नहीं है। ऐसा दृष्टिकोण किसी भी लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है और सभी समूहों द्वारा इसका तिरस्कार करना चाहिए। यह लोकतंत्र की मौत की घंटी बजा सकता है।
बातचीत और बहस लोकतंत्र का सार है। मौजूदा लोकसभा का सत्र लगातार बाधित रहा है और अंतिम दोनों सत्रों का हाल भी ऐसा ही रहने की आशंका है। ज्यादातर राज्य विधानसभाओं में साल में पचास दिन भी बैठकें नहीं होतीं। यह हमारे विधायी निकायों में बहस और बातचीत के प्रति उनके सदस्यों की उदासीनता को दिखाता है।
हमारे लोकतंत्र को अराजक होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। बेहतर आचरण के मानदंडों के अभाव में ऐसा हो सकता है। इस पतन को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। सभी दलों को तत्काल संकल्प पारित कर स्वयं को बहस एवं वार्ता के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए और संसद में ‘व्यवधान नहीं’ की नीति पर सहमति जतानी चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण और बुनियादी जरूरत है।
लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति, राज्य विधानसभाओं के स्पीकर और राजनीतिक दलों को मिलकर बैठक करनी चाहिए और एक आदर्श आचार संहिता तैयार करनी चाहिए। इसमें चार बातें होनी चाहिए। पहली, पांच वर्ष में सभी राज्य विधानसभाएं 300 दिन और संसद 600 दिन बैठेंगी। इस दौरान वे कम से कम 90 फीसदी समय का उपयोग उत्पादक कार्यों के लिए करेंगी। दूसरी बात, कोई भी सदस्य अगर वेल के भीतर प्रवेश करता है, तो उसे चेतावनी दी जा सकती है और दो बार ऐसा होने पर उसे एक हफ्ते के लिए निलंबित किया जा सकता है। अगर वह विरोध करता है, तो उसे साल भर के लिए निलंबित कर दिया जाएगा। किसी भी तरह के अनियंत्रित व्यवहार पर इसी तरह का दंड दिया जाएगा। तीसरी बात, हर दिन सामान्य प्रश्नकाल के अलावा विपक्षी दलों को विभिन्न मुद्दों पर हर हफ्ते सवाल करने का समय देना चाहिए और सरकार को तथ्य के साथ उसका उत्तर जरूर देना चाहिए। सरकार को जवाबदेह बनाए रखने के लिए संसदीय कामकाज को मजबूत बनाना चाहिए। चौथी बात, चुनाव आयोग को उन दलों की मान्यता रद्द करने पर विचार करना चाहिए, जिनके सदस्य लगातार सदन को बाधित करते हैं और लोकतांत्रिक मानदंडों का अपमान करते हैं। हर दो वर्ष पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए।