इस्राइल की धरती पर हमास द्वारा किए गए नरसंहार से पैदा हुआ युद्ध काल-क्षेत्र (टाइम जोन) को पार करते हुए इस्लाम के खिलाफ यहूदी युद्ध बन गया। दुनिया भर के इस्लाम समर्थक अब हमास के साथ खड़े हैं। हमास को इससे अधिक समर्थन की उम्मीद नहीं थी। अमेरिका के आठ उच्च प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालयों के परिसरों में विरोध प्रदर्शनों को यहूदी छात्रों के रूप में अपना दुश्मन मिल गया, जिन्हें बहिष्कृत करार दिया गया। शिक्षा जगत के खिलाफ ट्रंप का युद्ध अमेरिकी विश्वविद्यालयों को नए विचारों के नाम पर अपना एजेंडा चलाने के वायरस से मुक्त करने के उनके वादे से आगे बढ़कर, स्वयं शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमले में बदल गया है। लेकिन नरसंहार के बाद सबसे भयावह यहूदी-विरोधी आक्रोश के अपराधियों (हमास) को पीड़ित का दर्जा देने, अपराध और दंड की अदला-बदली करने की उदार नैतिकता एक राजनीतिक विशेषता है, जो अन्यत्र भी पाई जाती है। यह इस्लामोफोबिया शब्द में भी है। 9/11 के बाद यह एक उदारवादी आह्वान बन गया है, जब कट्टरपंथी इस्लाम (पूरे धर्म की बात करने से बचने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करने से बराक ओबामा ने इन्कार कर दिया था) साम्यवादोत्तर दुनिया में बुराई की शब्दावली में शामिल हो गया। जब पश्चिम के खंडहरों पर नव-खलीफा के विकल्प के लिए इस्लामिक स्टेट का अभियान चरम पर था (अपनी अपरिहार्य हार से पहले), इस्लामी मानसिकता का कट्टरपंथीकरण ऐसा विषय था, जिससे उदारवादियों ने बचना चाहा।
और जिन लोगों ने मानवता के विरुद्ध आतंक के साथ इस्लाम उपसर्ग जोड़ा, उन्हें इस्लामोफोब (मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह रखने वाले) की उपाधि मिल गई। इसका प्रभाव सभ्यता पर कलंक के समान पड़ा, क्योंकि कुछ लेखकों ने जिहाद के बीज धर्मग्रंथों और सत्ता में बैठे उनके सबसे वफादार पाठकों में ढूंढने का साहस किया। हमारे समय की सबसे जघन्य रक्तपिपासु अभिव्यक्तियों पर एक सशक्त आस्था द्वारा अनुमोदित ईमानदार चर्चा इस्लामोफोबिया द्वारा अनुक्रमित किए बिना लगभग असंभव हो गई। फिर भी, नायपॉल और होएलेबेक जैसे लेखकों ने साहस किया और बच गए।
यहां तक कि अरब के सुदूर रेतीले इलाकों से लेकर पेरिस की भीड़-भाड़ वाली सड़कों तक हत्यारे अपनी इस्लामी साख की वैश्विक स्वीकृति की मांग कर रहे थे, लेकिन उदारवादियों का गुस्सा आतंकवाद के खिलाफ गुस्से के शब्दार्थ पर केंद्रित था। नए कट्टरपंथ ने मृत्यु का पंथ बनाया। उदार नैतिकता ने जोर देकर कहा कि उनके चित्र में उनके अस्तित्व के मूल तत्वों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस्लामोफोबिया का आरोप नैतिक सेंसरशिप है, जिसे ‘हमले के तहत’ एक आस्था के कृपालु संरक्षकों (आतंकवादियों) द्वारा लागू किया जाता है।
आइए, अब पहलगाम की बात करते हैं। हममें से कुछ लोग हमले को वर्गीकृत करने में बहुत सावधान रहे हैं और विवरणों में इस्लाम शब्द को शामिल कर रहे हैं। जबकि कुछ लोगों ने ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ जैसे मुहावरे का सहारा लिया। आतंक की प्रकृति और उसके स्रोत ने इस भयावह घटना से इस्लाम को बाहर रखने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है। इस्लाम ही वह कारण है, जिसके कारण पाकिस्तान का जन्म हुआ, और यही है, जो पाकिस्तान को अविश्वास की शक्ति के विरुद्ध मजहबी प्रतिरोध के दृश्य और अदृश्य प्रवर्तक के रूप में परिभाषित करता है।
अकेले इस्लाम ने ही वह सौदेबाजी की शक्ति प्रदान की, जिसके बल पर पाकिस्तान को आतंकवाद के विरुद्ध पश्चिमी युद्ध में स्थायी स्थान प्राप्त हुआ। विरोधाभास स्पष्ट था-इस्लामी आतंकवाद का संरक्षक मुल्क, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पश्चिम (अमेरिका) के अग्रिम पंक्ति के सहयोगी की भूमिका भी निभा सकता है। संरक्षक और साझेदार की इस दोहरी भूमिका ने पाकिस्तान को ऐसी स्वतंत्रता प्रदान की है, जो कोई अन्य आतंकवाद प्रायोजक नहीं दे सकता। ईरान के लिए इस्लामी युद्ध एक क्रांतिकारी आवश्यकता है, जब तक कि इस्राइल और अमेरिका मौजूद हैं। पाकिस्तान के लिए जिहाद एक उद्देश्य और एक निवेश है। भारत ईरान के साथ है, जबकि अमेरिका पाकिस्तान के। समय-समय पर होने वाली पहलगाम जैसी घटनाएं इस उद्देश्य को जीवित रखती हैं।
ऐसा क्यों है कि पहलगाम हमला कुछ लोगों में सिर्फ संकोचपूर्ण गुस्सा पैदा करता है? ऐसा क्यों है कि इस्लामवाद को विश्लेषण से बाहर रखा जा रहा है? इस्लामवाद, जिसमें आध्यात्मिक और राजनीतिक लक्ष्य अस्थिर हो जाते हैं, को उदारवादी कृपा के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। इस्लाम उतना नाजुक धर्म नहीं है, जितना वे कल्पना करते हैं। फिर भी, वे वहां हमला करने वाले एक धर्म के रक्षक के रूप में मौजूद हैं, तथा उन लोगों को निर्वासित करने के लिए उत्सुक हैं, जो आतंकवाद के साथ ‘इस्लामिक’ विशेषण जोड़ते हैं, उन्हें इस्लामोफोब कहते हैं।
पहलगाम हमले पर उदारवादी बुद्धिजीवियों द्वारा बरती जा रही सावधानी नैतिक हीनता के साथ-साथ बौद्धिक टालमटोल भी है। अंततः यह आस्था की अमानवीय भयावहता को बिना किसी संदर्भ के अपराध में बदल देता है। और जो बात इसका समर्थन करने से रोकती है, वह है इसका मौन भाग : अति-हिंदूकृत भारत, जहां किसी को भी यह आभास हो जाना चाहिए था कि उदारवादी कुतर्क के दलदल में पीड़ित का धर्म पूछने की छूट है, लेकिन अपराधी के धर्म की बात उठाना वर्जित है।