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जाग रही हैं हिंदी पट्टी की महिलाएं

Thu, 12 Dec 2013 02:14 PM IST
मनीषा सिंह
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उत्तर प्रदेश में बहराइच जिले के भवानीपुर गांव की एक अनपढ़ महिला मनोरानी ने शौचालय बनाने के लिए अपनी पूरी जमीन देकर खुद भूमिहीन हो जाने की अनुकरणीय मिसाल पेश की है। अपने देश में शौचालयों का मुद्दा ऐसे ही त्याग की मांग करता है।
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मनोरानी जिस इलाके में रहती हैं, वह वनग्राम की जमीन है, यानी वहां कोई स्थायी निर्माण नहीं कराया जा सकता। प्रशासन की तरफ से वहां शौचालयों की व्यवस्था करने के लिए नासिक से पोर्टेबल शौचालय मंगाए गए, लेकिन उन्हें स्थापित करने के लिए जमीन उसके पास नहीं थी। यह दिक्कत मनोरानी ने दूर कर दी। अब वहां आठ पोर्टेबल शौचालय लगवा दिए गए हैं, जिससे ग्रामीणों, खास तौर पर महिलाओं को काफी सहूलियत हो गई है। उन्हें बारहों महीने लंबी दूरी तय कर जंगल का रुख करना पड़ता था, जो काफी खतरनाक भी था।

अद्भुत संयोग है कि ऐसे त्याग की मिसाल उसी राज्य में दिखी, जहां कुछ समय पहले कई विवाहिताओं ने शौचालय न होने के कारण ससुराल जाने से इन्कार कर दिया था।

लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े के मुताबिक, दुनिया में 2.6 अरब लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। भारत की आधी आबादी के पास मोबाइल फोन है, लेकिन लगभग इतने ही लोगों के पास शौचालय नहीं है। दरअसल जो गरीब खेती या मेहनत-मजदूरी कर थोड़ी पूंजी जमा करते हैं, उनकी प्राथमिकता में घर में शौचालय बनवाना नहीं है। हाथ आए पैसे को वे भोजन-पानी, दवा-दारू, कपड़े व शादी-ब्याह के लिए गहनों और बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं। शौचालयों की अनदेखी उन्हें मलेरिया और हैजा जैसी तमाम बीमारियों की ओर धकेलती है।
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महिला सशक्तिकरण के नजरिये से भी शौचालय एक जरूरी मुद्दा है। गांवों और छोटे कस्बों की महिलाओं को आज भी शौचादि से निवृत्त होने के लिए मुंह अंधेरे जंगल जाना पड़ता है। ऐसे जंगली और सुनसान इलाकों में जाने वाली महिलाओं के साथ अनगिनत वारदातें भी होती रहती हैं।

यह बात अनेक अध्ययनों में भी निकल कर आई है कि ग्रामीण महिलाएं दिन में शौच आदि से बचने के लिए कम मात्रा में पानी पीती हैं। यह आदत उन्हें कई बीमारियों की गिरफ्त में ले आती है। अगर हिंदू समाज महिलाओं के लिए निर्धारित निर्जला व्रत-उपवासों की तह में जाए, तो उसे पता चलेगा कि महिलाओं के लिए ऐसे व्रतों का विधान आखिर क्यों किया गया, जिनमें पानी की एक बूंद तक गले से नीचे उतारना वर्जित है।

ग्रामीण इलाकों में किशोरावस्था में अनेक लड़कियां अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देती हैं, क्योंकि अनेक ऐसे स्कूल हैं, जहां लड़कियों के लिए शौचालय नहीं होते। यदि शौचालय होते भी हैं, तो वे खुले में या ऐसी जगहों पर होते हैं, जहां स्कूल के बाहर से लोगों का प्रवेश हो सकता है। समय-समय पर स्कूली शौचालयों में बच्चियों के साथ वारदातों की खबर आती रही हैं, जिससे पढ़ाई बीच में छोड़ने वाली लड़कियों की मजबूरी स्पष्ट होती है।

अनेक जगह तो कार्यस्थलों, फैक्टरियों, दफ्तरों आदि में महिला कर्मचारियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं! नतीजा यही होता है कि महिलाएं या तो ऐसी मजबूरी में नौकरी छोड़ना उचित समझती हैं या किसी अनहोनी की आशंका के साथ मजबूरी में नौकरी करती हैं।

हमारे यहां यह मानसिकता अभी विकसित नहीं हो पाई कि घरों और दफ्तरों में स्वच्छ व सुरक्षित शौचालयों का अभाव पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए एक जरूरी मुद्दा है। हालांकि सुलभ इंटरनेशनल और कुछ एनजीओ इस दिशा में काम अवश्य कर रहे हैं, लेकिन सामाजिक कारणों और मुख्यतः गरीबी की वजह से साफ-सुथरे शौचालयों का घरों में निर्माण देश की बड़ी आबादी की प्राथमिकता में नहीं आ पाया है।

जन-जागरूकता का अभाव भी लोगों को शौचालयों के निर्माण पर खर्च से रोकता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस पर किए गए निवेश के बदले उन्हें कुछ नहीं मिलता। लेकिन हाल की घटनाएं बताती हैं कि हिंदी पट्टी की महिलाएं अब चुप नहीं रहेंगी। उन्हें यह एहसास होने लगा है कि घरों में शौचालय न होने का खामियाजा उन्हें ही ज्यादा भुगतना पड़ता है।
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