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चुनावी मैदान में जनता का आदमी

Tue, 12 Nov 2013 07:40 PM IST
कुमार प्रशांत
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पांच राज्यों में चुनावी बुखार के चरम में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के बिजावर विधानसभा क्षेत्र से निरंजन कुमार तिलक ने भी अपना नामांकन भरा है। पर वह किसी पार्टी के उम्मीदवार नहीं हैं। वह निर्दलीय उम्मीदवार भी नहीं हैं। वह पूरे देश में एकमात्र ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्हें उस मतदाता ने टिकट दिया है, जिसके वोट से उन्हें जीतना है।
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अब तक लोकतंत्र का एक ही स्वरूप था-वोट हमारा : उम्मीदवार उनका! हाई कमान भी उनकी, टिकट भी उनका, अनुशासन भी उनका, ह्विप भी उनका, और फिर भी हमारी अपेक्षा यह कि वह जन प्रतिनिधि की भूमिका अदा करे! दल प्रतिनिधि से लोक प्रतिनिधि बनने की यह अपेक्षा बबूल रोपकर आम खाने की आशा से भी अधिक असंभव साबित हुई। मतदाता खरीदने, धमकाने, भरमाने, भटकाने, बहकाने, लूटने, दबाने का पात्र बना दिया गया। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं हुआ कि लोग बुरे थे या दलों का नेतृत्व ईमानदार नहीं था।

दरअसल लोकतंत्र की इस संकल्पना में ही उसके जनद्रोही होने के बीज थे। इसे सबसे पहले पहचाना महात्मा गांधी ने! 1905 में, इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका जाते हुए, पानी के जहाज के डेक पर बैठकर बैरिस्टर गांधी ने हिंद स्वराज नाम की जो पुस्तिका लिखी, उसमें इस संसदीय लोकतंत्र को बांझ जैसे कठोर विशेषण से संबोधित किया। उनकी कल्पना के लोकतंत्र में, भारत के साढ़े सात लाख गांवों में साढ़े सात लाख सरकारें काम करेंगी और दिल्ली की सरकार को उनसे निर्देश लेना होगा!
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बिजावर विधानसभा क्षेत्र में कोई ढाई सौ गांव आते हैं। पिछले करीब दस महीनों से इनके घर-दरवाजे जा-जाकर, मतदाताओं के बीच बैठ-बैठकर युवाओं की टोलियों ने शिक्षण व संगठन का काम किया। इन सबने लोकतंत्र अभियान चला रखा है, जिसके तहत कोई दो सौ गांवों में मतदाता परिषदों का गठन हुआ है। वोट डालने का अधिकारी हर ग्रामीण अपनी मतदाता परिषद का सदस्य बन गया है। इस परिषद ने साथ बैठकर चुनी है अपनी दस सदस्यीय कार्यसमिति और अपना एक ग्राम प्रतिनिधि! हर गांव से एक, इस तरह चुनकर आए हैं दो सौ ग्राम प्रतिनिधि! इनसे बना है इस विधानसभा क्षेत्र का हाइकमांड! मतदाता परिषदों ने अपने हाइकमांड को निर्देश दिया कि चुनाव को देखते हुए वे अपने सारे सदस्यों को छोड़कर एक लोक उम्मीदवार एक राय से चुनें! संभावित लोक उम्मीदवारों के नाम सभी गांवों से आए और हाइकमांड के सदस्यों ने काटते-छांटते इस सूची को चार नामों तक पहुंचाया। इसके बाद सबसे कम समर्थन वाले नामों को सूची से बाहर करते हुए अंततः अपना सर्वसम्मत लोक उम्मीदवार चुना। तीस वर्षीय निरंजन कुमार तिलक एक शिक्षक हैं, जिनकी छवि एक सुलझे हुए, सबकी मदद करने वाले व्यक्ति के तौर पर है।

लोक उम्मीदवार के चयन में हाइकमांड ने जिस गंभीरता का परिचय दिया, उससे हमारे राजनीतिक दलों को सीखना चाहिए, जहां महीनों की जोड़-तोड़ के बाद भी टिकटों का बंटवारा अंतत: किन्हीं सोनिया गांधी या नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंपना पड़ता है। अब, जब पच्चीस नवंबर को सारा मध्य प्रदेश वोट डालने जाएगा, तब मतदाताओं को मिलेगा किसी दूसरे द्वारा चुना गया और अपने ऊपर थोपा गया उम्मीदवार। जबकि बिजावर के मतदाताओं को मिलेगा एक ऐसा उम्मीदवार, जिसे उसने ही टिकट दिया है, जिसका हाई कमांड वह खुद ही है और भविष्य में जो उनके प्रति ही जवाबदेह रहने वाला है।

बिजावर में अब एक नई स्थिति बनी है, जहां पार्टियां अपने ही मतदाता के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रही हैं। लोकतंत्र अभियान की तरफ से देश के सारे राजनीतिक दलों के अध्यक्षों को पत्र भेजा गया कि लोकतंत्र का क्षितिज व्यापक करने वाले इस प्रयोग का सम्मान कीजिए और बिजावर से अपनी पार्टी का उम्मीदवार मत खड़ा कीजिए। किसी ने इसका उत्तर देने की जहमत भी नहीं उठाई। लेकिन उत्तर देना तो पड़ेगा, जब वोट पड़ेंगे! राहुल बनाम मोदी जैसी टुच्ची राजनीति में लोकतंत्र को बंधक बनाने वालों को यह समझ में आए या न आए, पर बिजावर ने चुनावी अखाड़े में मतदाता को ला खड़ा किया है! यह मतदाता ही हमारे पतनशील लोकतंत्र की आखिरी आशा है।
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