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विपक्ष से उठती आवाजें

मनीषा प्रियम
Updated Thu, 05 Dec 2019 06:40 AM IST
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संसद - फोटो : a

यों तो लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत में है और राज्यसभा में भी वह विधेयकों को पारित करवाने में सक्षम रहती है, लेकिन हाल ही में हुए राज्य विधानसभा के चुनावों, खासकर हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों के बाद ऐसा लगता है कि लोकसभा में संख्या नहीं होने के बावजूद विपक्ष पूरी मजबूती से अपनी बातें आगे बढ़ा पा रहा है। सबसे पहला मजबूत विपक्षीय प्रदर्शन महाराष्ट्र में सरकार गठन के मुद्दे पर देखा गया। इस बात पर विपक्ष ने अपनी आवाज उठाई कि आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि राष्ट्रपति शासन अचानक सुबह 5.47 बजे हटाया गया। उसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किन्हीं आपातकालीन प्रावधानों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन खत्म करने का निवेदन राष्ट्रपति को भेजा। उन्होंने ऐसा मंत्रिमंडल की बैठक के बगैर ही किया। इसके साथ ही गवर्नर को भी यह निर्देश दिया गया कि भाजपा की सरकार को वहां शपथ ग्रहण कराया जाए। लेकिन इस मामले पर भाजपा को बाद में पीछे हटना पड़ा और विपक्ष की इच्छा के अनुसार वहां तीन पार्टियों-शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार बनी।



संसद में संख्या के लिहाज से विपक्ष मजबूत नहीं है, इसके बावजूद सरकार की आलोचना में कुछ आवाजें अब उठने लगी हैं। अर्थव्यवस्था इनमें से एक अहम मुद्दा है। सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 4.5 फीसदी पर आ पहुंची है और वित्त मंत्री कह रही हैं कि यह मंदी नहीं है। इस पर जाने-माने अर्थशास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है और दोहराया है कि नोटबंदी व जल्दबाजी में जीएसटी लागू किए जाने के चलते अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ी है। हालांकि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का मानना है कि ढीली अर्थव्यवस्था कुछ वैश्विक कारणों के चलते भी है, जिनमें अहम है अमेरिका तथा चीन के बीच चलने वाला व्यापार युद्ध। अभी हाल ही में एक व्यावसायिक अखबार के शीर्ष सम्मेलन में गृह मंत्री अमित शाह को जाने-माने उद्योगपति राहुल बजाज ने कहा कि भले ही इस सरकार की कई अहम उपलब्धियां रही हैं, लेकिन कुछ चूक भी हुई है और एक भय का वातावरण बना हुआ है, जिसके कारण लोग आलोचना करने से डरते हैं। राहुल बजाज के ऐसा कहते ही अर्थव्यवस्था पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई। सत्ता पक्ष के लोगों ने दलील दी कि अगर इतना ही भय का माहौल होता, तो राहुल बजाज यह बात ही नहीं कह पाते! हालांकि गृह मंत्री ने कहा कि किसी को डरने की जरूरत नहीं है, अगर इस तरह की धारणा बनी है, तो उसे हम ठीक करने की कोशिश करेंगे। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि इस पर काफी चर्चा हुई।


किरण मजूमदार शॉ ने भी कहा कि निवेशक और उद्योगपतियों के लिए कुछ मसले उलझन भरे और पेचीदा हैं। जाहिर है, राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर मजबूती के साथ सरकार की आलोचना होने लगी है। और महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे की इसमें बड़ी भूमिका मानी जानी चाहिए, जिससे लोगों को यह बल मिला कि भले भाजपा बहुमत में हो, पर उसकी आलोचना की जा सकती है। अगर आलोचना करने वालों को देखा जाए, तो उनमें कांग्रेस आगे नहीं है। आलोचना करने वालों में शरद पवार आगे हैं, या फिर भाजपा की पूर्व सहयोगी शिवसेना आगे है, इससे पहले ममता बनर्जी आगे रही हैं। यानी क्षेत्रीय दल सरकार की आलोचना मजबूती से कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर मनमोहन सिंह ने भी तीखी आलोचना की है, लेकिन राहुल गांधी इस आलोचना के केंद्र में नहीं हैं।


अब अर्थव्यवस्था की बदहाली और कृषि संकट या किसानों पर भाजपा के कमजोर पकड़ की बातें हो रही हैं। मोदी की टीम में ऐसे नेताओं की कमी महसूस की जा रही है, जिन्हें हिंदी भाषी क्षेत्रों में कृषि संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में अच्छी समझदारी हो। इसे मैन्यूफैक्चरिंग और कृषि के साथ ही पटरी पर लाया जा सकता है। जिम्मेदार उद्योगपति राहुल बजाज ने ऐसी बातें कही हैं, तो सरकार को यह ध्यान में रखना होगा कि उसे उद्योगपतियों के सहयोग से ही सुधार की दिशा में बढ़ना पड़ेगा। अब नकद हस्तांतरण और किसान सम्मान निधि से काम नहीं चलने वाला। किसानों को ऋण उपलब्ध कराना, कृषि मजदूरों को रोजगार देना और फसल का उचित मूल्य जैसे कुछ अहम मुद्दे हैं, जिस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा। ग्रामीण क्षेत्र में लोगों के पास खरीदने की क्षमता नहीं है, क्योंकि लोगों के हाथ में पैसा नहीं है।


इसके अलावा तीन और मुद्दे हैं, जिस पर संसद में चर्चा हो रही है-एसपीजी बिल, अनुच्छेद 370 और एनआरसी। एसपीजी बिल में संशोधन किया गया है, जिसके मुताबिक अब पूर्व प्रधानमंत्री का परिवार होने के नाते सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका को एसपीजी सुरक्षा नहीं मिलेगी। इसे लेकर कांग्रेस ने विरोध किया है, पर अन्य दल कांग्रेस का बहुत सहयोग नहीं कर रहे हैं। जहां तक अनुच्छेद 370 की बात है, तो जबसे इसे निष्क्रिय किया गया है, जम्मू-कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों- फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को नजरबंद करके रखा गया है। सरकार का दावा है कि वहां सुरक्षा व्यवस्था बेहतर हुई है और राज्य में अमन है, लेकिन असली स्थिति का पता तो तभी चलेगा, जब ये तीनों नेता छूटेंगे। इतने दिनों बाद भी वहां अगर तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को मुक्त करने पर हालात के सामान्य रहने का सरकार को भरोसा नहीं है, तो यह विडंबना है। साफ है कि तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को राजनीतिक कारणों से बंद किया गया है।


एनआरसी का विरोध पू्र्वोत्तर के राज्यों में भी हो रहा है और देश के कई अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी कर रहे हैं। भले ही विपक्ष की संख्या कम होने के चलते संसद के भीतर इस पर बहुत विरोध नहीं दिखता है, लेकिन संसद के बाहर इस पर चर्चा हो रही है। राज्यों की राजनीति और राज्यों की स्वायत्तता, जो संघीय प्रणाली का मुख्य लक्षण है, वह एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है। केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी का शासन, इस मॉडल को बहुत पसंद नहीं किया जा रहा है। सरकार को इस मुद्दे पर सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा।

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